नई दिल्ली: सियासत के गलियारों से एक ऐसा बयान सामने आया है, जिसने दिल्ली से लेकर पूरे देश में एक नई बहस को जन्म दे दिया है. एक तरफ मज़हब और कर्तव्य की दुहाई है, तो दूसरी तरफ इसे समाज को भड़काने वाली ‘खुली धमकी’ बताया जा रहा है. आखिर मौलाना महमूद मदनी ने ऐसा क्या कहा कि बीजेपी सांसद मनोज तिवारी को कहना पड़ा कि ‘ये शरीफों की भाषा नहीं है’?
मदनी के बयान पर सियासी बवाल
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी का एक कथित बयान चर्चा का केंद्र बन गया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, मदनी ने ‘जिहाद’ को एक पवित्र कर्तव्य बताते हुए कुछ बातें कहीं, जिसे लेकर राजनीतिक घमासान छिड़ गया है. उनके इस बयान के सामने आने के बाद कई राजनीतिक दलों और नेताओं ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी है, जिससे विवाद और गहराता जा रहा है.
इस बयान की सटीक पंक्तियां और संदर्भ अभी भी बहस का विषय हैं, लेकिन इसके कथित अर्थ ने एक बड़े विवाद को हवा दे दी है. आलोचकों का मानना है कि इस तरह की टिप्पणी से समाज में गलत संदेश जा सकता है और यह भड़काऊ प्रकृति की है.
मनोज तिवारी का पलटवार, बोले- यह खुली धमकी है
इस मामले पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया दिल्ली से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सांसद मनोज तिवारी की ओर से आई है. उन्होंने मौलाना मदनी के बयान पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे सीधे तौर पर एक ‘खुली धमकी’ करार दिया. मनोज तिवारी ने कहा कि ऐसी भाषा कोई भी शरीफ इंसान इस्तेमाल नहीं कर सकता.
तिवारी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा:
- यह बयान समाज को भड़काने वाला है.
- इस तरह की भाषा एक सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है.
- यह एक गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी है जिससे शांति भंग हो सकती है.
‘यह एक आपराधिक प्रवृत्ति की भाषा है’
मनोज तिवारी यहीं नहीं रुके. उन्होंने इस बयान की तुलना एक अपराधी की भाषा से कर दी. उनके अनुसार, “यह भाषा किसी अपराधी प्रवृत्ति के व्यक्ति की हो सकती है, जो समाज में सौहार्द और शांति नहीं चाहता.” बीजेपी सांसद ने मदनी के बयान की निंदा करते हुए इसे समाज के लिए खतरनाक बताया और कहा कि इस तरह की बयानबाजी पर लगाम लगनी चाहिए. फिलहाल, इस बयान पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है और यह विवाद जल्द थमता नहीं दिख रहा है.




