Bihar Politics: सियासी बिसात पर मकर संक्रांति का दही-चूड़ा सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि गहरे संदेशों का पैगाम लेकर आया। पटना की फिजा में तिल-चूड़ा की खुशबू के साथ राजनीतिक गर्माहट भी महसूस की गई, जो आने वाले समय में बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत दे रही है।
Bihar Politics: नीतीश कुमार ने लोजपा के दही-चूड़ा भोज में पहुंचकर बढ़ाई सियासी सरगर्मी, क्या हैं मायने?
Bihar Politics: बिहार में नई राजनीतिक समीकरणों की आहट?
मकर संक्रांति के पावन पर्व पर पटना के 1-व्हीलर रोड, शहीद पीर अली खां मार्ग स्थित लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रदेश कार्यालय में आयोजित पारंपरिक दही-चूड़ा भोज ने बिहार के राजनीतिक गलियारों में अचानक और तेज हलचल मचा दी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की इस कार्यक्रम में उपस्थिति ने एक साथ कई अटकलों को जन्म दिया है, जिसने बिहार की राजनीति के हर कोने में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया। यह आयोजन महज एक सामाजिक समारोह या पर्वतीय मिलन नहीं था, बल्कि इसके गहरे राजनीतिक निहितार्थ माने जा रहे हैं, जिन्हें प्रदेश के हर सियासी पंडित अपनी-अपनी तरह से विश्लेषित कर रहे हैं। मुख्यमंत्री का लोजपा (रामविलास) के निमंत्रण पर पहुंचना, जहां पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया, ने साफ संकेत दिया कि प्रदेश की सियासत में आने वाले दिनों में कुछ बड़ा होने वाला है, जिसकी नींव इस दही-चूड़ा भोज में रखी गई है।
नीतीश कुमार का यह कदम ऐसे संवेदनशील समय में आया है जब भाजपा के साथ उनके मौजूदा गठबंधन के भविष्य और संबंधों को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं और कयास लगाए जा रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी सुगबुगाहट तेज है कि नीतीश कुमार के राजनीतिक फैसले हमेशा चौंकाने वाले रहे हैं। इस भोज में जदयू और राजद के कई बड़े नेता भी प्रमुखता से मौजूद थे, लेकिन सबकी निगाहें मुख्यमंत्री और युवा नेता चिराग पासवान के बीच की गर्मजोशी और उनके संवाद पर टिकी थीं। यह सार्वजनिक मेल-मिलाप उस पुरानी कड़वाहट को भुलाता हुआ स्पष्ट तौर पर दिखा, जो 2020 के विधानसभा चुनावों के दौरान दोनों के बीच गंभीर रूप से पैदा हुई थी। उस समय चिराग पासवान ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ एक तरह से राजनीतिक मोर्चा खोल दिया था, जिससे जदयू को काफी नुकसान पहुंचा था।
सियासी दोस्ती या नई रणनीति का अहम हिस्सा?
राजनीतिक विश्लेषक और जानकार बताते हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह कदम केवल एक शिष्टाचार भेंट नहीं है, बल्कि भाजपा पर परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से दबाव बनाने की एक सोची-समझी रणनीति का अहम हिस्सा भी हो सकता है। यह एक बार फिर दिखाता है कि राजनीतिक दांव-पेंच में माहिर नीतीश कुमार अपने विकल्पों को हमेशा खुला रखते हैं और सही समय पर सही चाल चलने में पीछे नहीं हटते। मकर संक्रांति के इस विशेष भोज में जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह, मंत्री विजय कुमार चौधरी, संजय कुमार झा, अशोक चौधरी, सुनील कुमार, मदन सहनी, रत्नेश सदा और श्रवण कुमार जैसे दिग्गज नेताओं की उपस्थिति भी कार्यक्रम के महत्व को बढ़ा रही थी। वहीं, सत्ताधारी गठबंधन के सहयोगी दल राजद की ओर से उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, विधानसभा अध्यक्ष अवध बिहारी चौधरी, मंत्री तेज प्रताप यादव, आलोक मेहता, अनिता देवी, ललित यादव और रामानंद यादव भी प्रमुखता से मौजूद रहे। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। बड़े नेताओं की यह बहुलता कार्यक्रम के राजनीतिक महत्व को और भी अधिक रेखांकित करती है।
यह नजारा बिहार की वर्तमान राजनीतिक तस्वीर को एक नया और अप्रत्याशित रंग दे रहा है। हाल ही में, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पटना में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा था कि उन्होंने राज्य सरकार द्वारा निर्धारित कार्यों को बखूबी निभाया है। इसके साथ ही, विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की मुंबई में हुई महत्वपूर्ण बैठक के बाद भी नीतीश कुमार की नाराजगी और असहजता की खबरें राजनीतिक हलकों में घूम रही थीं। इन सभी घटनाक्रमों के बीच लोजपा के मंच पर मुख्यमंत्री की मौजूदगी ने बिहार के राजनीतिक भविष्य को लेकर उत्सुकता कई गुना बढ़ा दी है। क्या यह सिर्फ एक शिष्टाचार भेंट थी, एक पुरानी खाई को पाटने का प्रयास, या फिर बिहार की आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए नए राजनीतिक गठबंधन की एक मजबूत नींव रखने का प्रयास? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में बिहार की राजनीतिक दिशा तय करेंगे। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
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फिलहाल, राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि क्या नीतीश कुमार एक बार फिर अपने पुराने सहयोगियों के करीब आ रहे हैं, या यह केवल भाजपा को यह संदेश देने की कवायद है कि उनके पास अन्य विकल्प भी मौजूद हैं। चिराग पासवान के साथ उनकी बढ़ती नजदीकी को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। 2020 के चुनावों में दोनों के बीच की तल्खी अब दोस्ती में बदलती दिख रही है, जो बिहार के बदलते सियासी समीकरणों का स्पष्ट संकेत है।

