



Patna High Court: रिश्तों की डोर जब विश्वास के धागे से बंधी हो और टूट जाए, तो क्या हर टूटे रिश्ते को अपराध का रंग दिया जा सकता है? बिहार की न्यायिक चौखट से एक ऐसा फैसला आया है, जो आपसी संबंधों और सहमति की नई परिभाषा गढ़ता है। पटना हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि दो बालिग व्यक्ति अपनी मर्जी और आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाते हैं, तो उसे बलात्कार के अपराध के रूप में नहीं देखा जा सकता। न्यायमूर्ति सोनी श्रीवास्तव की एकलपीठ ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में कहा है कि रजामंदी से बने रिश्तों को सिर्फ इसलिए आपराधिक श्रेणी में नहीं डाला जा सकता क्योंकि बाद में दोनों पक्षों के बीच विवाह नहीं हो सका। यह फैसला उन मामलों में बड़ी राहत लेकर आया है जहाँ निजी रिश्तों की विफलता के बाद दुष्कर्म की धाराएं लगा दी जाती हैं।
पटना हाई कोर्ट: सहमति से बने संबंधों पर नया दृष्टिकोण
उच्च न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई करते हुए भागलपुर के अपर सत्र न्यायाधीश के उस पुराने आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी पर दुष्कर्म का आरोप तय किया गया था। यह मामला मोहम्मद सैफ अंसारी की ओर से दायर एक आपराधिक याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। हाईकोर्ट ने पाया कि उपलब्ध सबूत और परिस्थितियां किसी भी तरह से बलात्कार की परिभाषा में फिट नहीं बैठती हैं। अदालत ने माना कि आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत मुकदमा चलाना निराधार है और ऐसे मामलों को आगे बढ़ाना कानून का समय बर्बाद करना है।
इस मामले की पृष्ठभूमि यह थी कि पीड़िता ने आरोप लगाया था कि अभियुक्त ने शादी का झांसा देकर एक साल तक उसके साथ संबंध बनाए, लेकिन बाद में शादी से मुकर गया। इस पर अदालत ने बहुत गहरी टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने कहा कि झूठा वादा करना और शादी न हो पाना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। अगर सहमति से बने रिश्ते शुरू होते समय दोनों पक्ष राजी थे और बाद में किन्हीं परिस्थितियों के कारण विवाह संभव नहीं हो पाया, तो इसे स्वतः दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। रजामंदी से बने संबंधों के टूटने को आपराधिक रंग देना कानून की मूल भावना के खिलाफ है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
कानून का दुरुपयोग रोकने की कवायद
पटना हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते समय सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का भी हवाला दिया। अदालत ने साफ किया कि अगर महिला बालिग है और उसने बिना किसी दबाव के अपनी स्वतंत्र सहमति दी है, तो संबंध टूटने पर उसे अपराध नहीं माना जाएगा। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। साथ ही, हाईकोर्ट ने निचली अदालतों को यह कड़ा संदेश दिया कि वे किसी भी आपराधिक मामले को दर्ज करते समय या आरोप तय करते समय केवल औपचारिकता न निभाएं। तथ्यों और साक्ष्यों की गंभीरता से जांच की जानी चाहिए ताकि कानून का दुरुपयोग रोका जा सके और न्याय व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ न पड़े। सहमति से बने रिश्ते की व्याख्या में यह फैसला एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।



