Patna News: जब कानून की किताबें धूल फाड़ रही हों और सड़कों पर बेकाबू रफ्तार जिंदगी को रौंद रही हो, तब यही समझना चाहिए कि सिस्टम में कहीं बड़ा छेद है। पटना की सड़कों पर धड़ल्ले से दौड़ रही जुगाड़ गाड़ियां इसी दोहरे रवैये की जीती-जागती मिसाल पेश कर रही हैं।
पटना न्यूज़: मंत्री के आदेश, हाईकोर्ट की रोक के बावजूद बेखौफ दौड़ रहीं जुगाड़ गाड़ियां, क्यों खामोश है प्रशासन?
पटना न्यूज़: जुगाड़ गाड़ियों पर लगाम क्यों नहीं?
बिहार की राजधानी पटना में इन दिनों सड़कों पर एक अजीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है। एक तरफ परिवहन मंत्री श्रवण कुमार द्वारा जुगाड़ गाड़ियों पर रोक लगाने का सख्त आदेश जारी किया गया था, तो दूसरी तरफ पटना हाईकोर्ट ने इन पर प्रतिबंध संबंधी कुछ पहलुओं पर रोक लगा रखी है। इस खींचतान के बीच आम जनता की जान पर खतरा मंडरा रहा है, क्योंकि बिना किसी सुरक्षा मानक और रजिस्ट्रेशन के सैकड़ों जुगाड़ गाड़ियां शहर की प्रमुख सड़कों पर सरपट दौड़ रही हैं। यह स्थिति कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करती है। इन वाहनों से न केवल यातायात नियमों का उल्लंघन हो रहा है, बल्कि इनसे दुर्घटनाओं का जोखिम भी लगातार बना रहता है। परिवहन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि ऐसे अनधिकृत वाहनों के कारण सड़क हादसों की संख्या में इजाफा हुआ है।
इन जुगाड़ गाड़ियों में अक्सर क्षमता से अधिक सवारियां या सामान ढोया जाता है, जो सुरक्षा के लिहाज से बेहद खतरनाक है। इनकी ब्रेकिंग सिस्टम से लेकर लाइट और हॉर्न तक, कुछ भी मानक के अनुरूप नहीं होता। ऐसे में आपात स्थिति में ये वाहन बड़े हादसे का सबब बन सकते हैं। स्थानीय प्रशासन और ट्रैफिक पुलिस की उदासीनता इस समस्या को और गंभीर बना रही है। जब मंत्री के आदेश और माननीय उच्च न्यायालय की टिप्पणी के बीच ऐसी गाड़ियां बेखौफ दौड़ती हैं, तो यह सीधे तौर पर कानून-व्यवस्था की पोल खोलता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। सवाल यह है कि आखिर कौन है जो इन नियमों को ताक पर रखकर सड़कों पर मौत का सामान ढोने की इजाजत दे रहा है?
कानून और सड़कों के बीच फंसा आम नागरिक
शहर के अलग-अलग इलाकों में, खासकर सब्जी मंडियों और ग्रामीण क्षेत्रों से सटे इलाकों में, इन जुगाड़ गाड़ियों का बोलबाला है। ये सस्ते किराए या भाड़े के लालच में यात्रियों और छोटे व्यापारियों के लिए आकर्षक विकल्प तो बन जाते हैं, लेकिन इनकी असुरक्षा को नजरअंदाज कर दिया जाता है। जिला परिवहन पदाधिकारी (DTO) के कार्यालय को इन पर कार्रवाई करनी है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर न के बराबर दिख रहा है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। ऐसी स्थिति में आम नागरिक असमंजस में है कि वह किस पर भरोसा करे—कानून के कागजों पर या सड़कों पर दिख रही हकीकत पर। यह दिखाता है कि सिर्फ आदेश जारी कर देना काफी नहीं है, बल्कि उनका सख्ती से पालन करवाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जब तक ठोस कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ये जुगाड़ गाड़ियां पटना की सड़कों पर इसी तरह बेखौफ दौड़ती रहेंगी और आमजन की जान जोखिम में डालती रहेंगी। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
प्रशासन को इस दोहरी व्यवस्था से बाहर निकलकर एक स्पष्ट नीति अपनाने की जरूरत है। या तो इन वाहनों को वैध बनाने और सुरक्षा मानकों के साथ पंजीकृत करने का रास्ता निकाला जाए, या फिर इन्हें पूरी तरह से प्रतिबंधित कर सख्ती से इसका पालन करवाया जाए। इस मामले में कोई भी ढिलाई नागरिकों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ होगी, जिसे एक जिम्मेदार सरकार और प्रशासन कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।


