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29 नवम्बर, 2025

सुप्रीम कोर्ट का रेलवे से तीखा सवाल: ‘ऑनलाइन टिकट पर ही क्यों बीमा, ऑफलाइन वाले यात्री क्या इंसान नहीं?’

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दिल्ली से आया एक ऐसा सवाल, जिसने भारतीय रेलवे की वर्षों पुरानी बीमा नीति पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है। आखिर क्यों, रेलवे सिर्फ ऑनलाइन टिकट खरीदने वाले यात्रियों को ही दुर्घटना बीमा का लाभ देती है, जबकि देश के लाखों लोग आज भी खिड़की पर लंबी कतारों में लगकर अपनी यात्रा का टिकट खरीदते हैं? यह सवाल सिर्फ यात्रियों के हितों से जुड़ा नहीं, बल्कि रेलवे की “डिजिटल इंडिया” नीति पर भी एक गंभीर बहस छेड़ता है, जिसकी गूंज अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गई है।

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सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख

भारतीय रेलवे में सफर करने वाले करोड़ों यात्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी चिंता व्यक्त की है। न्यायमूर्ति ए.एस. बोपन्ना और न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा की खंडपीठ ने रेलवे से तीखे सवाल पूछे हैं, खासकर उस प्रावधान को लेकर जो दुर्घटना बीमा का लाभ केवल ऑनलाइन टिकट बुक करने वाले यात्रियों तक सीमित रखता है। कोर्ट ने इस नीति पर सवाल उठाते हुए जानना चाहा है कि जब दुर्घटना से सभी यात्रियों को समान खतरा होता है, तो बीमा का लाभ देने में यह भेदभाव क्यों?

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बीमा पॉलिसी पर उठे सवाल

सुप्रीम कोर्ट का यह सवाल एक याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया है, जिसमें रेलवे की बीमा पॉलिसी में विसंगति को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से पूछा है कि “आप (रेलवे) केवल ऑनलाइन टिकट खरीदने वालों को ही बीमा का लाभ क्यों देते हैं? क्या ऑफलाइन टिकट खरीदने वाले यात्री, जो काउंटर पर जाकर टिकट लेते हैं, उन्हें बीमा की आवश्यकता नहीं है? क्या वे अलग-अलग प्रकार के यात्री हैं?” यह टिप्पणी रेलवे की वर्तमान बीमा योजना पर सीधे तौर पर सवाल खड़ा करती है, जो डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई थी।

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डिजिटल डिवाइड और आम यात्री

अदालत की इस टिप्पणी का सीधा संबंध भारत की विशाल आबादी से है, जिसमें एक बड़ा वर्ग आज भी डिजिटल रूप से पिछड़ा हुआ है या उसके पास ऑनलाइन लेनदेन के साधन उपलब्ध नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों और ऐसे कई कस्बों में, जहां इंटरनेट की पहुंच सीमित है या लोग स्मार्टफोन का उपयोग नहीं करते, वहां आज भी बड़ी संख्या में लोग रेलवे स्टेशन के काउंटरों से ही टिकट खरीदते हैं। ऐसे में, यदि दुर्घटना होने पर उन्हें बीमा का लाभ नहीं मिलता है, तो यह स्पष्ट रूप से एक “डिजिटल डिवाइड” का निर्माण करता है, जहां नागरिकों के मौलिक अधिकारों और सुरक्षा में असमानता उत्पन्न होती है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पहलू पर रेलवे से जवाब मांगा है, यह समझते हुए कि यह नीति लाखों गरीब और कम पढ़े-लिखे यात्रियों के साथ अन्याय कर सकती है।

रेलवे को देना होगा जवाब

अब रेलवे को सुप्रीम कोर्ट के इन सवालों का जवाब देना होगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि रेलवे अपनी वर्तमान नीति का बचाव कैसे करती है और क्या वह इसे सभी यात्रियों के लिए समान रूप से लागू करने पर विचार करती है। इस मामले पर अगली सुनवाई में और भी महत्वपूर्ण बातें सामने आने की उम्मीद है, जो भारतीय रेलवे में यात्रा करने वाले हर नागरिक के लिए दुर्घटना बीमा के भविष्य को तय कर सकती हैं।

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