

India-Bangladesh Relations: बांग्लादेश में हुए हालिया आम चुनावों के बाद राजनीतिक गलियारों में एक नई लहर देखने को मिली है, जहां तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने पूर्ण बहुमत हासिल कर एक स्थिर सरकार का मार्ग प्रशस्त किया है। यह चुनावी परिणाम सिर्फ बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति का हिस्सा नहीं, बल्कि इसका सीधा और गहरा असर भारत-बांग्लादेश संबंधों पर पड़ना तय है। भू-राजनीतिक मोर्चे पर एक महत्वपूर्ण बदलाव की ओर इशारा करते हुए, यह देखना दिलचस्प होगा कि नई ढाका सरकार दिल्ली के साथ अपने रिश्तों को किस दिशा में आगे बढ़ाती है, विशेषकर तब जब क्षेत्रीय संतुलन और आर्थिक साझेदारी दोनों दांव पर हैं।
बांग्लादेश में BNP की वापसी: क्या बदलेंगे भारत-बांग्लादेश संबंध और चीन की भूमिका?
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन और भारत-बांग्लादेश संबंधों पर असर
बांग्लादेश में तारिक रहमान की पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को पूर्ण बहुमत मिलना न केवल वहां के राजनीतिक परिदृश्य को स्थिरता देगा, बल्कि यह भारत के लिए अपनी ‘पड़ोसी पहले’ (Neighborhood First) नीति को नए सिरे से परिभाषित करने का अवसर भी प्रस्तुत करता है। पिछले वर्षों में, दोनों देशों के बीच व्यापारिक और रणनीतिक साझेदारी में उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। यह नई सरकार एक ऐसी स्थिति में आई है जहां दोनों देशों के बीच संबंधों को एक नई दिशा मिल सकती है, जो क्षेत्रीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
आंकड़ों पर गौर करें तो, 2024 में भारत और बांग्लादेश के बीच द्विपक्षीय व्यापार 13.51 बिलियन डॉलर रहा है। इस व्यापार में भारत को 9.2 बिलियन डॉलर से अधिक का व्यापार अधिशेष (trade surplus) प्राप्त हुआ है। यह दिखाता है कि बांग्लादेश भारत के लिए एक महत्वपूर्ण व्यापारिक भागीदार रहा है। नई सरकार के आने से, भारत द्वारा बांग्लादेश को प्रदान की गई 8 बिलियन डॉलर की ‘लाइन ऑफ क्रेडिट’ (Line of Credit) परियोजनाओं को गति मिलने की उम्मीद है, जिससे दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध और मजबूत हो सकते हैं।
हालांकि, BNP का ऐतिहासिक झुकाव चीन और उसकी महत्वाकांक्षी ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (Belt and Road Initiative) की ओर रहा है। यह प्रवृत्ति भारत के लिए एक रणनीतिक चुनौती पेश कर सकती है। चीन की बढ़ती मौजूदगी से क्षेत्रीय शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है और भारत को अपनी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने के लिए नए सिरे से रणनीति बनानी होगी। भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि नई ढाका सरकार के नेतृत्व में बांग्लादेश-चीन संबंधों में और प्रगाढ़ता आ सकती है, जिससे भारत के लिए अपनी विदेश नीति में अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता होगी। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
इन सभी परिवर्तनों के बीच, भारत को अपनी ‘पड़ोसी पहले’ नीति को न केवल प्रभावी ढंग से रीसेट करना होगा, बल्कि बांग्लादेश के साथ विश्वास और सहयोग के नए क्षेत्रों का पता लगाना होगा। यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा कि द्विपक्षीय संबंध किसी भी तीसरे देश के प्रभाव से परे मजबूत रहें। रियल-टाइम बिजनेस – टेक्नोलॉजी खबरों के लिए यहां क्लिक करें ताकि दोनों देशों के बीच व्यापारिक और रणनीतिक साझेदारी निरंतर विकास करती रहे।
आगे की राह और भारत की चुनौतियाँ
भारत को बांग्लादेश की नई सरकार के साथ संवाद स्थापित करने और साझा हितों को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय रूप से काम करना होगा। आर्थिक सहयोग, सुरक्षा साझेदारी और लोगों से लोगों के बीच संपर्क को मजबूत करना इस रणनीति का अभिन्न अंग होगा। सीमा पार व्यापार को सुगम बनाना, कनेक्टिविटी परियोजनाओं में निवेश बढ़ाना और क्षेत्रीय मंचों पर सहयोग जारी रखना भारत के लिए आवश्यक होगा। यह समय भारत के लिए अपनी कूटनीति का प्रदर्शन करने और यह सुनिश्चित करने का है कि बांग्लादेश के साथ उसके संबंध मजबूत और पारस्परिक रूप से लाभप्रद बने रहें, भले ही क्षेत्रीय भू-राजनीति में बदलाव आते रहें। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।




