
Gold Price: ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों पर अहम फैसले के बीच, बीते कारोबारी दिन सोने और चांदी की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। एक ओर जहां शेयर बाजार में भारी बिकवाली देखी गई, वहीं कीमती धातुओं के खरीदारों के लिए यह एक राहत भरी खबर बनकर उभरी है। यह गिरावट वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और निवेशकों की बदलती रणनीतियों को साफ तौर पर दर्शाती है।
Gold Price में भारी गिरावट: निवेशक समझें बाजार का गणित
Gold Price में क्यों आई ये बड़ी गिरावट?
बीते गुरुवार को वैश्विक बाजारों में अमेरिकी स्पॉट गोल्ड 1.22 प्रतिशत की उल्लेखनीय गिरावट के साथ 4836 डॉलर प्रति औंस पर आ गया, जबकि स्पॉट सिल्वर 2.25 प्रतिशत टूटकर 75.75 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गया। घरेलू वायदा बाजार मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर भी इसका असर दिखा, जहां सोना लगभग 1.55 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम और चांदी लगभग 2.50 लाख रुपये प्रति किलोग्राम पर आ गई। इस गिरावट का मुख्य कारण अमेरिकी फेडरल रिजर्व के आगामी फैसले से पहले निवेशकों की सतर्कता थी। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने वैश्विक महंगाई को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं, जिससे निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं या अपनी स्थिति का पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया में तीन सप्ताह से अधिक समय से जारी तनाव और शांति की कोई स्पष्ट उम्मीद न दिखना बाजार की अस्थिरता को और बढ़ा रहा है। वहीं, उम्मीद के मुताबिक फेडरल रिजर्व ने अपनी ब्याज दरों में लगातार दूसरी बार कोई बदलाव नहीं किया है, हालांकि इससे पहले लगातार तीन बार 0.25 प्रतिशत की दर से कटौती की गई थी। इस बार भी दरों में यथास्थिति बनाए रखने से बाजार में एक मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिली, लेकिन कीमती धातुओं पर इसका तत्काल प्रभाव गिरावट के रूप में सामने आया। रियल-टाइम बिजनेस – टेक्नोलॉजी खबरों के लिए यहां क्लिक करें
सोना-चांदी की कीमतें कैसे होती हैं निर्धारित?
सोने और चांदी के दाम कई जटिल कारकों के आधार पर रोजाना तय किए जाते हैं। इनमें सबसे प्रमुख है अमेरिकी डॉलर-रुपया विनिमय दर। चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनकी कीमतें डॉलर में तय होती हैं, ऐसे में डॉलर का मजबूत होना या रुपये का कमजोर होना भारत में सोने-चांदी को महंगा कर देता है। भारत में बड़ी मात्रा में सोने का आयात होता है, जिस पर लगने वाला सीमा शुल्क (Import Duty), GST और अन्य स्थानीय कर भी इसकी अंतिम कीमत को सीधे प्रभावित करते हैं।
वैश्विक बाजार में भू-राजनीतिक उथल-पुथल, जैसे युद्ध, आर्थिक मंदी या केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों में बदलाव, का भी इन धातुओं की कीमतों पर गहरा असर पड़ता है। अनिश्चितता के दौर में निवेशक शेयरों या अन्य जोखिमपूर्ण संपत्तियों के बजाय सोने जैसे सुरक्षित ठिकानों की तलाश करते हैं, जिससे इसकी मांग और कीमतें बढ़ जाती हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। भारत में सोना केवल एक निवेश विकल्प नहीं है, बल्कि यह परंपरा और सांस्कृतिक मान्यताओं से भी जुड़ा है। शादी-ब्याह, त्योहारों और शुभ अवसरों पर सोने की भारी मांग होती है, जो इसकी कीमतों को ऊपर ले जाती है। फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति भी सीधे तौर पर डॉलर की चाल और वैश्विक तरलता को प्रभावित करती है, जिसका असर सोने पर भी दिखता है।
इसके अलावा, सोना लंबे समय से महंगाई के खिलाफ एक बेहतर बचाव के रूप में देखा जाता है। जब महंगाई बढ़ती है या शेयर बाजार में अत्यधिक जोखिम होता है, तो लोग अपनी पूंजी को सुरक्षित रखने के लिए सोने में निवेश करना पसंद करते हैं। यही कारण है कि इसकी मांग और कीमत हमेशा बनी रहती है, भले ही अल्पकालिक उतार-चढ़ाव क्यों न आएं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।



