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जनवरी, 16, 2026
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भारत का Defence Budget: जीडीपी के अनुपात में घटता सैन्य खर्च और बढ़ती चुनौतियां

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Defence Budget: अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी भी देश की विदेश नीति की मज़बूती उसके रक्षा तंत्र की ताकत पर निर्भर करती है। जिस राष्ट्र की सैन्य और सुरक्षा क्षमता जितनी सशक्त होती है, वह वैश्विक पटल पर बिना किसी दबाव के अपने राष्ट्रीय हितों की वकालत उतनी ही दृढ़ता से कर पाता है। यही कारण है कि आज विश्व के लगभग सभी प्रमुख देश अपने रक्षा बजट पर भारी निवेश कर रहे हैं, जो उनकी भू-रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं और सुरक्षा प्राथमिकताओं को दर्शाता है। अमेरिका ने जहां वर्ष 2027 के लिए अपने रक्षा बजट को बढ़ाकर 1.5 ट्रिलियन डॉलर करने का प्रस्ताव दिया है, जो पहले के अनुमानों से लगभग 50 प्रतिशत अधिक है, वहीं भारत का पड़ोसी चीन भी अपने सैन्य खर्च में लगातार वृद्धि कर रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 में चीन ने रक्षा बजट पर लगभग 245 अरब डॉलर खर्च किए, जो वैश्विक सैन्य शक्ति संतुलन में उसके बढ़ते दबदबे को स्पष्ट करता है। ऐसे में भारत के लिए अपने Defence Budget की समीक्षा और भविष्य की रणनीति तय करना अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।

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भारत का Defence Budget: जीडीपी के अनुपात में घटता सैन्य खर्च और बढ़ती चुनौतियां

Defence Budget और आर्थिक विकास: एक सामरिक विश्लेषण

पिछले 15 वर्षों में भारत के रक्षा खर्च का रुझान देखें तो सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के अनुपात में इसमें लगातार गिरावट देखने को मिलती है।

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  • 2010-11 में रक्षा खर्च जीडीपी का 2.71% था।
  • 2015-16 में यह 2.41% रहा।
  • 2020-21 में 2.88% तक पहुंचा।
  • 2022-23 में 2.21% पर आ गया।
  • 2023-24 में 1.97% पर गिरा।
  • 2024-25 में 1.89% तक पहुंच गया।
  • 2025-26 में घटकर 1.90% के आसपास रहने का अनुमान है।
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ये आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि बढ़ते वैश्विक तनावों और सुरक्षा चुनौतियों के बावजूद, भारत का रक्षा खर्च जीडीपी के अनुपात में सीमित होता जा रहा है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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वित्त वर्षजीडीपी का कितना हिस्सा बजट पर खर्च प्रतिशत में
2015-162.41
2020-212.88
2022-232.21
2023-241.97
2024-251.89

आज वैश्विक हालात बेहद अस्थिर हैं। ईरान, वेनेजुएला, यूक्रेन युद्ध और मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने सुरक्षा चुनौतियों को और गहरा कर दिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि बजट 2026 में भारत को रक्षा खर्च को लेकर कैसी रणनीति अपनानी चाहिए? आर्थिक मामलों के जानकार मनीष कुमार गुप्ता का कहना है कि अब रक्षा क्षेत्र में निवेश सिर्फ जीडीपी, रोजगार या व्यापार तक सीमित नहीं है। यह सीधे तौर पर भारत की सामरिक शक्ति और वैश्विक प्रभाव का पैमाना बन चुका है। जब भारत रक्षा उपकरणों का निर्यात करता है, तो वह सिर्फ हथियार नहीं बेचता, बल्कि खुद को दुनिया के ताकतवर देशों की कतार में स्थापित करता है। एक मजबूत रक्षा निर्यातक देश की बात अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ज्यादा गंभीरता से सुनी जाती है। मनीष गुप्ता के अनुसार, आईएमएफ और विश्व बैंक द्वारा भारत की विकास दर को लेकर जताया गया भरोसा भी काफी हद तक डिफेंस सेक्टर से जुड़ा है। डिफेंस एक हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर है, जो टेक्नोलॉजी, एमएसएमई और स्किल डेवलपमेंट को एक साथ जोड़ता है। इससे आयात घटता है, निर्यात बढ़ता है और करंट अकाउंट बैलेंस पर सकारात्मक असर पड़ता है। फिलहाल डिफेंस सेक्टर का जीडीपी में योगदान करीब 2 प्रतिशत है, जिसे सही नीतियों से 2.5 प्रतिशत तक ले जाया जा सकता है। यह दर्शाता है कि सैन्य खर्च देश की आर्थिक प्रगति में भी सहायक हो सकता है।

रक्षा उद्योग में सुधार और आत्मनिर्भरता की राह

हालांकि इसके लिए कुछ कड़े फैसले जरूरी हैं।

  • रक्षा खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना।
  • टेंडर सिस्टम में ‘लॉबिंग’ और बार-बार रद्द होने की समस्या पर लगाम लगाना।
  • सेना की खरीद में 75 प्रतिशत तक स्वदेशी उत्पादों की हिस्सेदारी सुनिश्चित करना।
  • एमएसएमई को सस्ता कर्ज और समय पर भुगतान की गारंटी देना।
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आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इन सुधारों के बिना आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग की कल्पना अधूरी रहेगी। मनीष गुप्ता का कहना है कि आज की लड़ाई तोप-गोले से ज्यादा डेटा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और साइबर टेक्नोलॉजी की है। इसलिए बजट 2026 में एआई, साइबर सिक्योरिटी और अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी पर विशेष जोर दिया जाना चाहिए। हालांकि डिफेंस निर्यात कई गुना बढ़ा है और 50 हजार करोड़ रुपये तक ले जाने का लक्ष्य है, लेकिन घोषणाओं और जमीनी अमल के बीच अभी भी बड़ा अंतर है।

वायुसेना और मूलभूत औद्योगिक क्षमता का महत्व

वहीं रक्षा विशेषज्ञ और रिटायर्ड विंग कमांडर प्रफुल्ल बख्शी का मानना है कि भारत को सबसे ज्यादा ध्यान वायुसेना (Air Force) पर देना होगा, क्योंकि आधुनिक युद्ध की शुरुआत और दिशा तय करने में एयरफोर्स की भूमिका सबसे अहम होती है। उनके मुताबिक, रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर निवेश बढ़ाना बेहद जरूरी है। प्रफुल्ल बख्शी यह भी कहते हैं कि भारत की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी बेसिक इंडस्ट्रियल क्षमता है। जब तक राष्ट्रीय उद्योग मजबूत नहीं होगा, तब तक रक्षा उद्योग भी मजबूत नहीं हो सकता। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। आज भारत मेटल-ग्रेड इंजन जैसी कई अहम चीजें खुद नहीं बना पा रहा है। अगर युद्ध के समय हथियारों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहेंगे, तो लंबे समय तक संघर्ष नहीं कर पाएंगे। इसलिए दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए स्वदेशी उद्योग और मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करना अनिवार्य है। रियल-टाइम बिजनेस – टेक्नोलॉजी खबरों के लिए यहां क्लिक करें

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