Rupee vs Dollar: डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है, जिससे आयातकों की चिंताएं बढ़ गई हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौतियां सामने आ रही हैं। यह गिरावट केवल एक संख्या नहीं, बल्कि एक जटिल आर्थिक समीकरण का परिणाम है जो वैश्विक और घरेलू कारकों से प्रभावित है। इस लेख में हम रुपये की मौजूदा स्थिति, उसके पीछे के कारणों और भविष्य की संभावित चाल पर गहराई से विचार करेंगे।
Rupee vs Dollar: भारतीय रुपये में आई रिकॉर्ड गिरावट, क्या हैं इसके कारण और भविष्य की संभावनाएं?
शुक्रवार को भारतीय करेंसी रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 22 पैसे टूटकर 90.20 डॉलर पर बंद हुआ। इसका सीधा अर्थ है कि अब एक डॉलर खरीदने के लिए आपको 90 रुपये से अधिक चुकाने होंगे। यह लगातार गिरते रुपये की एक और कड़ी है, हालांकि इससे ठीक एक दिन पहले गुरुवार को रुपये में छह पैसे की बढ़त दर्ज की गई थी और यह 89.92 पर पहुंच गया था। आयातकों के बीच डॉलर की बढ़ती मांग और बाजार में तरलता (लिक्विडिटी) की कमी के चलते रुपये के मुकाबले डॉलर में लगातार मजबूती देखी जा रही है।
Rupee vs Dollar: रुपये के कमजोर होने की वजहें और बाजार का रुझान
शुरुआत में, सरकारी बैंकों द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को अमेरिकी डॉलर बेचे जाने से रुपये को कुछ हद तक सहारा मिला था। लेकिन, कच्चे तेल के आयातकों की तरफ से बढ़ती मांग के कारण डॉलर फिर से मजबूत हुआ और रुपये पर दबाव बढ़ गया। वर्तमान में, बाजार का पूरा ध्यान मुद्रा में उतार-चढ़ाव और RBI के संभावित हस्तक्षेप पर केंद्रित है, जिसमें FX स्वैप और तरलता बढ़ाने वाले ऑपरेशन शामिल हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। ये वैश्विक और घरेलू कारकों का मिला-जुला असर है जो रुपये की चाल को प्रभावित कर रहा है।
2025 में रुपये का प्रदर्शन और विदेशी निवेशकों की भूमिका
साल 2025 भारतीय रुपये के लिए अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 5 प्रतिशत की गिरावट के साथ आया, जो 2022 के बाद से इसका सबसे खराब वार्षिक प्रदर्शन रहा। हालांकि, भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने भविष्यवाणी की है कि 2026 में इसमें सुधार की उम्मीद है। एसबीआई फंड्स मैनेजमेंट की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली, निर्यात की धीमी रफ्तार और आयातकों से बढ़ी हुई हेजिंग डिमांड के कारण करेंसी पर भारी दबाव था।
विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी बाजारों से लगभग 18 बिलियन डॉलर निकाल लिए, जिसका मुख्य कारण कमाई में गिरावट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के नेतृत्व वाली वैश्विक वृद्धि में सीमित हिस्सेदारी और अन्य उभरते बाजारों में बेहतर अवसर थे। यह गौर करने वाली बात है कि पिछले साल जब डॉलर कमजोर हुआ और दुनिया की अधिकांश प्रमुख मुद्राएं मजबूत हुईं, तब भी इन आंतरिक और बाहरी वजहों से रुपया कमजोर बना रहा।
SBI की भविष्यवाणी: 2025-26 में रुपये की चाल और भविष्य की चुनौतियां
आगामी वित्तीय वर्ष में, रुपये में लगभग 2 प्रतिशत की और गिरावट आने का अनुमान है, जिससे विनिमय दर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 92 के आसपास रहने की संभावना है। हालांकि, इसे कई महत्वपूर्ण कारकों से समर्थन मिलने की उम्मीद है। एसबीआई की रिपोर्ट में बताया गया है कि मजबूत सेवा निर्यात (सर्विस एक्सपोर्ट) और कच्चे तेल की कम कीमतों के कारण भारत का चालू खाता घाटा (करेंट अकाउंट डेफिसिट) सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 1 प्रतिशत से कम रहने की संभावना है। इसके साथ ही, खुदरा महंगाई दर भारतीय रिजर्व बैंक के 4 प्रतिशत के लक्ष्य के करीब रहने की उम्मीद है, जिससे रुपये को किसी बड़े झटके से उबरने में मदद मिलेगी। रियल-टाइम बिजनेस – टेक्नोलॉजी खबरों के लिए यहां क्लिक करें। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। ये कारक मिलकर रुपये की स्थिरता को प्रभावित करेंगे।
लंबी अवधि में, रुपये की चाल काफी हद तक भारत की आर्थिक वृद्धि दर, वैश्विक पूंजी प्रवाह और कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर करेगी। भारत सरकार और आरबीआई दोनों ही रुपये की स्थिरता बनाए रखने के लिए विभिन्न मौद्रिक और राजकोषीय उपायों पर विचार कर रहे हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए रखना है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।




