
नई दिल्ली: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 4 अक्टूबर को भारत आ रहे हैं। यह करीब 30 घंटे की यात्रा वैश्विक राजनीति और व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यूक्रेन युद्ध के बाद यह उनका पहला भारत दौरा होगा, जिसमें व्यापार समझौतों और रक्षा सहयोग पर बड़े फैसले संभव हैं। इस स्थिति में दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि भू-राजनीतिक तनाव, टैरिफ युद्ध और बदलते वैश्विक गठबंधनों के बीच भारत किस दिशा में आगे बढ़ेगा।
व्यापार टैरिफ पर घमासान
व्यापार टैरिफ इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू रहा है। अप्रैल में भारत समेत 100 से अधिक देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाए गए थे। रूस से रियायती दर पर कच्चा तेल खरीदने के कारण भारत पर 50% अतिरिक्त टैरिफ का दबाव और बढ़ गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार चेतावनी देते रहे कि रूस के साथ व्यापार बढ़ाने पर भारत को कड़ी सजा मिलेगी।
रूस से तेल खरीद पर संकट
इसी वजह से भारत ने रूस से तेल की खरीद काफी हद तक कम कर दी, जबकि यह व्यापार भारतीय कंपनियों को सालाना एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का फायदा देता था। साथ ही, रुपये-रूबल निपटान से विदेशी मुद्रा भंडार भी मजबूत होता था। अब रूसी तेल की खरीद का भविष्य भी संकट में है।
भारत-रूस व्यापार का आईना
भारत और रूस के व्यापार के आंकड़े भी बड़ा अंतर दिखाते हैं। भारत का रूस को निर्यात केवल 4.9 अरब डॉलर है, जबकि आयात 63.8 अरब डॉलर तक पहुंचता है। कच्चे तेल और उर्वरक जैसी वस्तुओं में 80-90% व्यापार होने से व्यापार घाटा कई गुना बढ़ जाता है।
अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध
वहीं, भारत-अमेरिका व्यापार देखें तो निर्यात 87.3 अरब डॉलर और आयात 41.5 अरब डॉलर है, जो अमेरिका को भारत का सबसे बड़ा और उच्च-मूल्य वाला व्यापार भागीदार बनाता है। इसके बावजूद भारत नए व्यापारिक गठजोड़ बनाने पर काम कर रहा है।
चीन के साथ सुधार की उम्मीद
शंघाई शिखर सम्मेलन के बाद भारत-चीन आर्थिक संबंधों में सुधार के संकेत मिले हैं। कई क्षेत्रों में चीनी फर्मों के लिए नियम आसान किए जा रहे हैं। साथ ही, आईटी और बायोमेडिसिन में भारत के निर्यात को बढ़ाने पर भी काम जारी है।









