Railway Budget: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आगामी 1 फरवरी को देश का आम बजट पेश करने वाली हैं, जो वित्त मंत्री के रूप में उनका लगातार नौवां बजट होगा। उन्होंने पहली बार 2019 में बजट पेश किया था। इस महत्वपूर्ण अवसर पर देश के हर वर्ग और सेक्टर को उनसे काफी उम्मीदें हैं। इस बीच, हम आपको बजट से जुड़ी एक ऐतिहासिक परंपरा के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसे अब समाप्त कर दिया गया है।
रेलवे बजट: एक सदी पुरानी परंपरा का अंत, जानें क्या हैं इसके फायदे और नुकसान!
रेलवे बजट: अंग्रेजों के दौर में शुरू हुई थी यह प्रथा
यह जानना दिलचस्प है कि बजट में रक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे विभिन्न महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल होते हैं। रेलवे भी इनमें से एक है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब रेलवे बजट को केंद्रीय बजट से अलग पेश किया जाता था। रेलवे बजट को अलग से पेश करने की यह परंपरा 1924 में ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू की गई थी। उस समय एक विशेष समिति ने यह तर्क दिया था कि रेलवे का बजट इतना विशाल और महत्वपूर्ण है कि इसे सामान्य बजट के तहत प्रबंधित नहीं किया जा सकता। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। 1947 में भारत की आजादी के बाद भी यह परंपरा 92 वर्षों तक बिना किसी रुकावट के जारी रही। इसके तहत, रेल मंत्री केंद्रीय बजट से कुछ दिन पहले अपना अलग रेलवे बजट पेश करते थे, जिसमें रेलवे की आय, व्यय, यात्री किराए और माल ढुलाई दरों का विस्तृत ब्यौरा होता था।
दशकों पुरानी परंपरा का अंत क्यों हुआ?
वित्त वर्ष 2016-17 तक, रेलवे बजट को केंद्रीय बजट से अलग ही प्रस्तुत किया जाता था। हालांकि, 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद, रेलवे बजट को देश के आम बजट में मिला लिया गया। दरअसल, अलग रेलवे बजट को समाप्त करने की मुहिम को 2016 में नीति आयोग के तहत अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता वाली एक समिति की सिफारिशों के बाद गति मिली। देबरॉय और अर्थशास्त्री किशोर देसाई द्वारा लिखे गए एक पेपर में समिति ने यह तर्क दिया कि भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश बचा था जो इस प्रथा का पालन कर रहा था, और आधुनिक सार्वजनिक वित्त में अब इसका कोई व्यावहारिक उद्देश्य नहीं रह गया था। पेपर में वित्तीय प्रबंधन को आधुनिक बनाने और सरकारी खर्च की अधिक स्पष्ट तस्वीर पेश करने के लिए रेलवे के वित्त को केंद्रीय बजट में शामिल करने की सलाह दी गई थी।
समिति के इस प्रस्ताव पर सरकार के भीतर गहन चर्चा हुई। तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। बाद में, वित्त मंत्री अरुण जेटली इस मामले को संसद में ले गए, जहां राज्यसभा में भी इस पर व्यापक चर्चा हुई। आखिरकार, जेटली ने 2017-18 के लिए पहला एकीकृत आम बजट पेश किया, जिसने आधिकारिक तौर पर अलग रेलवे बजट की परंपरा को समाप्त कर दिया। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
एकीकरण से क्या हुए लाभ?
रेलवे बजट को आम बजट में शामिल करने से कई महत्वपूर्ण फायदे हुए। सबसे पहले, इसकी तैयारी और संसद में इस पर बहस करने में लगने वाले समय की बचत हुई, जिससे बहुमूल्य संसाधनों का सदुपयोग हो सका। इसके अलावा, रेलवे द्वारा सरकार को दिए जाने वाले लाभांश (डिविडेंड) की प्रथा समाप्त हो गई, जिससे उस पर वित्तीय बोझ कम हुआ। इसका एक मुख्य उद्देश्य परिवहन क्षेत्र – रेलवे, सड़कों और जलमार्गों – में बेहतर तालमेल स्थापित करना भी था, ताकि बुनियादी ढांचा योजना को एक ही एकीकृत ढांचे के तहत किया जा सके। इस कदम से काफी पारदर्शिता भी आई, क्योंकि केंद्र सरकार की आय और व्यय को अब एक ही दस्तावेज में दर्शाया जाने लगा, जिससे संसद और निवेशकों के लिए वित्तीय जांच करना आसान हो गया। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
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