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फ़रवरी, 26, 2026
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आमलकी एकादशी: व्रत कथा और इसका दिव्य महत्व

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Amalaki Ekadashi: फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी एकादशी के नाम से जाना जाता है, जो भगवान विष्णु और आंवले के वृक्ष को समर्पित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र दिन भगवान विष्णु की आराधना और आंवले के वृक्ष की पूजा करने से भक्तों को समस्त पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत आरोग्य, धन और सौभाग्य प्रदान करने वाला माना गया है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इस दिन व्रत रखने और विधि-विधान से कथा श्रवण करने का विशेष धार्मिक महत्व है।

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आमलकी एकादशी: व्रत कथा और इसका दिव्य महत्व

आमलकी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व

सनातन धर्म में एकादशी तिथि का विशेष स्थान है, और उनमें भी आमलकी एकादशी का पुण्य लाभ अत्यंत अद्वितीय है। यह माना जाता है कि स्वयं भगवान विष्णु ने सृष्टि की रचना के लिए जब ब्रह्माजी को उत्पन्न किया, तब उसी समय आंवले का वृक्ष भी उत्पन्न हुआ। इसलिए आंवले के वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवों का वास माना जाता है। इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा से त्रिदेवों का आशीर्वाद प्राप्त होता है, आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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आमलकी एकादशी व्रत कथा

प्राचीन काल में एक पुण्यात्मा राजा मान्धाता हुए। उनके राज्य में सभी प्रजाजन धर्मात्मा थे। एक बार राजा मान्धाता ने ऋषि वशिष्ठ से पूछा कि क्या कोई ऐसा व्रत है, जिससे अक्षय पुण्य की प्राप्ति हो और जो मुक्ति दिला सके? तब ऋषि वशिष्ठ ने उन्हें आमलकी एकादशी व्रत का विधान बताया। वशिष्ठ मुनि ने बताया कि एक समय पूर्व में च्यवन ऋषि ने राजा मान्धाता को एक कथा सुनाई थी। उस कथा के अनुसार, वैदिश नाम के एक नगर में सभी वर्णों के लोग निवास करते थे और वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे। नगर में चैत्ररथ नामक राजा राज करता था। राजा चैत्ररथ फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत बहुत श्रद्धापूर्वक करते थे। एक बार राजा अपनी प्रजा के साथ आमलकी एकादशी का व्रत कर रहे थे और आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर पूजा-अर्चना कर रहे थे। उसी समय एक भूखा शिकारी वहां आया। वह भूख से व्याकुल था और उसने राजा और प्रजा को यह करते देखा। वह वहीं एक वृक्ष पर छिपकर बैठ गया और एकादशी व्रत की कथा तथा भगवान विष्णु के कीर्तन को सुनता रहा। जब सुबह हुई तो सभी अपने घर लौट गए, लेकिन शिकारी वहीं बैठा रहा। उसे भूख से मूर्छा आ गई और वह वहीं गिरकर मर गया। इस प्रकार अनजाने में उसने आमलकी एकादशी का व्रत कर लिया। इस व्रत के प्रभाव से और कथा सुनने के पुण्य से वह शिकारी अगले जन्म में विदर्भ देश का राजा बना और उसका नाम ‘वसुराथ’ हुआ। उसके राज्य में धर्म और न्याय का बोलबाला था।

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यह कथा इस बात का प्रमाण है कि आमलकी एकादशी का व्रत अनजाने में भी मनुष्य को महान फल देता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह व्रत मनुष्य को सभी पापों से मुक्त कर विष्णुलोक की प्राप्ति कराता है।

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निष्कर्ष और उपाय

आमलकी एकादशी का पावन पर्व हमें प्रकृति और परमात्मा के दिव्य संबंध की याद दिलाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ आंवले के वृक्ष का पूजन करना अत्यंत कल्याणकारी होता है। व्रत के दिन निम्नलिखित मंत्र का जाप कर सकते हैं:

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

इस दिन सात्विक भोजन ग्रहण करें (जो लोग व्रत नहीं रख रहे)। गरीबों को दान करना और ब्राह्मणों को भोजन कराना भी विशेष फलदायी माना जाता।

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