अंतिम संस्कार: हिंदू धर्म में मृत्यु के उपरांत अंतिम संस्कार का अपना एक विशिष्ट स्थान है, जो आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है।
अंतिम संस्कार: मृत्यु उपरांत पीपल पर मटका लटकाने का आध्यात्मिक रहस्य और महत्व
अंतिम संस्कार और पीपल वृक्ष का दिव्य संबंध
अंतिम संस्कार का हिन्दू धर्म में गहरा महत्व है, और इससे जुड़ी अनेक परंपराएं हैं। सनातन परंपराओं में प्रत्येक कार्य के पीछे गहरा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व निहित होता है। जब बात अंतिम संस्कार के पश्चात किए जाने वाले कर्मकांडों की आती है, तो पीपल वृक्ष का उल्लेख अवश्य होता है। कई लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर अंतिम संस्कार के बाद पीपल पर मटका क्यों लटकाया जाता है और इसका धार्मिक महत्व क्या है? आइए, इस गूढ़ रहस्य को समझते हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
मृत्यु के उपरांत जब शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है, तब आत्मा अपने सूक्ष्म रूप में कुछ समय तक अपने पुराने वासस्थान के आसपास विचरण करती है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान आत्मा को शांति और तृप्ति प्रदान करने के लिए विभिन्न संस्कार किए जाते हैं। पीपल वृक्ष को त्रिदेवों का वास स्थान माना गया है – जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और पत्तियों में शिव। इसलिए, इसे देववृक्ष की संज्ञा दी गई है और यह आत्माओं के लिए भी एक पवित्र आश्रय स्थल माना जाता है।
पीपल पर मटका लटकाने का महत्व:
- आत्मा की तृप्ति: पीपल पर मटका लटकाने से उसमें से बूंद-बूंद करके जल गिरता रहता है, जो वायुमंडल को शीतलता प्रदान करता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह जल मृत आत्मा को तृप्ति और शांति प्रदान करता है। यह एक प्रतीकात्मक क्रिया है, जिसके माध्यम से यह दर्शाया जाता है कि मृतक के प्रति श्रद्धा और प्रेम अभी भी जीवित है।
- पितृ दोष से मुक्ति: यह क्रिया मृत आत्मा को मुक्ति मार्ग पर आगे बढ़ने में सहायता करती है और परिवार को किसी भी प्रकार के पितृ दोष से बचाने में सहायक मानी जाती है।
- वातावरण की शुद्धि: पीपल वृक्ष 24 घंटे ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है, जिससे आसपास का वातावरण शुद्ध रहता है। अंतिम संस्कार के बाद, जब शोक का माहौल होता है, तो पीपल के पास यह क्रिया करने से मन को शांति मिलती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
इस परंपरा का पालन करने से मृत आत्मा को शांति मिलती है और परिवार को पुण्य की प्राप्ति होती है। यह क्रिया शोक संतप्त परिवार को मानसिक रूप से संबल प्रदान करती है और उन्हें यह विश्वास दिलाती है कि उन्होंने अपने प्रियजन के लिए अंतिम समय में भी सभी उचित कर्म किए हैं।
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यह परंपरा मात्र एक अंधविश्वास नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो जीवन और मृत्यु के चक्र को गहराई से समझने में मदद करती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।




