Bhagwan Shiv: सृष्टि के पालक, संहारक और कल्याणकारी महादेव, जिन्हें नीलकंठ, भोलेनाथ और चंद्रशेखर जैसे अनेक नामों से जाना जाता है, वे अपनी जटाओं में चंद्रमा को धारण करते हैं। यह रहस्य कई सदियों से भक्तों को आकर्षित करता रहा है।
भगवान शिव: आखिर क्यों विराजते हैं महादेव की जटाओं में चंद्रमा?
भगवान शिव और चंद्र देव का अलौकिक संबंध
सनातन धर्म में भगवान शिव का स्वरूप अत्यंत विलक्षण और प्रेरणादायी है। उनके मस्तक पर सुशोभित चंद्रमा केवल एक आभूषण नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक और पौराणिक कथा का प्रतीक है। क्या आप जानते हैं कि देवों के देव महादेव ने चंद्र को अपनी जटाओं में क्यों स्थान दिया? यह केवल एक चमत्कार नहीं, बल्कि करुणा, संरक्षण और धर्म स्थापना की एक अनुपम गाथा है, जिसे आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
प्राचीन पौराणिक कथा के अनुसार, प्रजापति दक्ष ने अपनी सत्ताईस पुत्रियों का विवाह चंद्र देव से करवाया था। इन सभी पुत्रियों में चंद्र को रोहिणी सर्वाधिक प्रिय थीं, जिसके कारण वे अन्य पत्नियों की उपेक्षा करने लगे थे। अपनी पुत्रियों के कष्ट से व्यथित होकर, प्रजापति दक्ष ने चंद्र देव को क्षय रोग का श्राप दे दिया, जिससे उनकी चमक और कलाएँ घटने लगीं। चंद्र देव धीरे-धीरे क्षीण होने लगे, और उनके साथ ही धरती पर औषधियों और वनस्पतियों का जीवन भी प्रभावित होने लगा।
चंद्र देव अपने इस दारुण कष्ट से मुक्ति पाने के लिए ब्रह्मा जी की शरण में गए। ब्रह्मा जी ने उन्हें भगवान शिव की घोर तपस्या करने का परामर्श दिया। चंद्र देव ने पूरी श्रद्धा और एकाग्रता के साथ भगवान शिव की आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर, करुणासागर भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने चंद्र देव की पीड़ा को समझा और उनके कष्ट का निवारण करने के लिए उन्हें अपनी जटाओं में धारण कर लिया। शिव के मस्तक पर विराजते ही चंद्र देव का क्षय रोग दूर हो गया और उनकी कलाएँ पुनः चमकने लगीं। भगवान शिव ने उन्हें यह वरदान भी दिया कि वे पूर्णिमा के दिन अपनी पूर्ण कलाओं से युक्त होंगे और अमावस्या के दिन अपनी एक कला के साथ निवास करेंगे, जिसके बाद वे पुनः धीरे-धीरे वृद्धि प्राप्त करेंगे। इस प्रकार, भगवान शिव ‘चंद्रशेखर’ कहलाए, जिसका अर्थ है ‘जिसके मस्तक पर चंद्रमा विराजमान हो’।
आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह घटना दर्शाती है कि भगवान शिव अपने भक्तों के कष्टों को दूर करने के लिए कितने तत्पर रहते हैं। यह केवल चंद्र को दिया गया वरदान नहीं था, बल्कि समस्त सृष्टि के कल्याण के लिए एक महत्वपूर्ण घटना थी, क्योंकि चंद्र के तेज से ही पृथ्वी पर जीवन का संतुलन बना रहता है। जब आप यह कथा सुनते हैं, तो आपको महसूस होगा कि आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। चंद्र ग्रहण का ज्योतिषीय और आध्यात्मिक महत्व भी इस पौराणिक कथा से जुड़ा है, जहाँ शिव की जटाओं में चंद्रमा का आश्रय एक स्थायी समाधान प्रस्तुत करता है।
यह कथा हमें सिखाती है कि चाहे कितनी भी बड़ी विपत्ति क्यों न आ जाए, यदि हम सच्चे हृदय से ईश्वर की शरण में जाते हैं, तो निश्चित रूप से हमें उससे मुक्ति मिलती है। भगवान शिव की यह लीला उनके भक्तवत्सल स्वरूप और कल्याणकारी स्वभाव को प्रदर्शित करती है। यह हमें विनम्रता, धैर्य और ईश्वर पर अटूट विश्वास रखने की प्रेरणा देती है।
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भगवान शिव की महिमा अपरंपार है और उनकी प्रत्येक लीला का गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। चंद्र को धारण करना भी इसी श्रंखला का एक हिस्सा है, जो हमें जीवन में आने वाली कठिनाइयों के बावजूद आशा और धैर्य बनाए रखने का संदेश देता है।

