Dah Sanskar: सनातन धर्म में जीवन के सोलह संस्कारों का अत्यंत महत्व है, जो जन्म से लेकर मरणोपरांत तक व्यक्ति की यात्रा को शुद्ध और पवित्र बनाते हैं। इन्हीं संस्कारों में अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है दाह संस्कार, जिसका पालन आत्मा की शांति और उसे मोक्ष की प्राप्ति के लिए अत्यंत आवश्यक माना गया है।
सनातन धर्म में दाह संस्कार: एक पवित्र परंपरा और उसके गूढ़ नियम
जब कोई प्राणी इस नश्वर शरीर का त्याग करता है, तो उसके पार्थिव शरीर को अग्नि को समर्पित करने की यह क्रिया केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक अनुष्ठान है। भारतीय संस्कृति में, विशेष रूप से हिंदू धर्म में, मृत्यु को जीवन का अंत नहीं, बल्कि आत्मा का एक शरीर से दूसरे शरीर में गमन माना जाता है। दाह संस्कार की यह प्रक्रिया आत्मा को भौतिक बंधनों से मुक्त कर उसे अपनी आगे की यात्रा पर निर्बाध रूप से बढ़ने में सहायता करती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। शास्त्रों में, विशेषकर गरुड़ पुराण में, दाह संस्कार के उपरांत कुछ नियमों का पालन करना अनिवार्य बताया गया है, जिनका संबंध दिवंगत आत्मा की सद्गति और परिवार के कल्याण से है।
दाह संस्कार के उपरांत क्यों न देखें पीछे मुड़कर?
सनातन धर्म में यह एक महत्वपूर्ण नियम है कि दाह संस्कार संपन्न होने के उपरांत परिजन बिना पीछे मुड़े घर की ओर लौट आएं। इसके पीछे गहरा धार्मिक और मनोवैज्ञानिक महत्व छिपा है। माना जाता है कि जब पार्थिव शरीर को अग्नि को समर्पित किया जाता है, तो आत्मा धीरे-धीरे अपने भौतिक शरीर के बंधनों से मुक्त होने लगती है। यदि परिजन पीछे मुड़कर देखते हैं, तो इससे दिवंगत आत्मा का मोह अपने परिवार और सांसारिक बंधनों में बना रह सकता है। यह आत्मा को मुक्ति प्राप्त करने और आगे की यात्रा पर बढ़ने में बाधा उत्पन्न कर सकता है।
आत्मा की शांति और परिजनों का कल्याण
पीछे मुड़कर न देखने का एक अन्य कारण यह भी है कि श्मशान घाट पर नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव हो सकता है। सीधे घर लौट आने से व्यक्ति उस नकारात्मक ऊर्जा से दूर रहता है और किसी भी अनिष्ट से सुरक्षित रहता है। इसके अतिरिक्त, यह नियम परिजनों को इस सत्य को स्वीकार करने में भी मदद करता है कि अब दिवंगत आत्मा शारीरिक रूप से उनके साथ नहीं है, और उन्हें उस आत्मा की सद्गति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। यह उनके मन को शांति प्रदान करता है और उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
दाह संस्कार से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण नियम
- दाह संस्कार सदैव दिन के समय ही किया जाना चाहिए। सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार वर्जित माना गया है, क्योंकि ऐसा करने से आत्मा को परलोक में कष्ट हो सकता है और उसे मुक्ति मिलने में कठिनाई आती है।
- दाह संस्कार के बाद घर आकर स्नान करना अनिवार्य है, ताकि शरीर और मन को शुद्ध किया जा सके।
- दाह संस्कार में शामिल होने वाले लोगों को अपने नाखून नहीं काटने चाहिए, और न ही दाढ़ी या बाल कटवाने चाहिए, जब तक कि तेरहवीं संस्कार संपन्न न हो जाए।
- शोक की अवधि में किसी भी शुभ कार्य से बचना चाहिए और सात्विक जीवन शैली का पालन करना चाहिए।
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निष्कर्ष और उपाय
इस प्रकार, दाह संस्कार के उपरांत पीछे मुड़कर न देखने का नियम सनातन परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो न केवल दिवंगत आत्मा की सद्गति सुनिश्चित करता है बल्कि परिजनों को भी मानसिक शांति और सुरक्षा प्रदान करता है। यह हमें सिखाता है कि जीवन नश्वर है और आत्मा अमर है, जिसे अंततः अपने परम धाम की ओर प्रस्थान करना होता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। प्रत्येक व्यक्ति को इस संस्कार के नियमों का आदरपूर्वक पालन करना चाहिए, ताकि दिवंगत आत्मा को शांति और मोक्ष प्राप्त हो सके तथा परिजनों को भी इस कठिन समय में धैर्य और संबल मिल सके।





