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Sankashti Chaturthi : आज चतुर्थी तिथि..कीजिए भगवान गणेश की पूजा, द्विजप्रिय गणेश की दिव्य व्रत कथा सुने और पाएं मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद… मंत्र और पूजा विधि

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Sankashti Chaturthi: प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि भगवान गणेश को समर्पित होती है। यह दिन भक्तों को विघ्नहर्ता के आशीर्वाद से संकटों से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। आज हम द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के पावन महत्व और इसकी दिव्य व्रत कथा पर प्रकाश डालेंगे, जो आपके जीवन में सुख-समृद्धि लाएगी।

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Sankashti Chaturthi पर सुनें द्विजप्रिय गणेश की दिव्य व्रत कथा और पाएं मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद

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द्विजप्रिय Sankashti Chaturthi की महिमा और पूजन विधि

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सनातन धर्म में भगवान गणेश की उपासना का विशेष महत्व है। चतुर्थी तिथि पर उनके द्विजप्रिय स्वरूप का पूजन भक्तों के लिए ज्ञान, बुद्धि और समृद्धि के द्वार खोलता है। यह वह दिन है जब गणेश जी की कृपा से समस्त विघ्न दूर होते हैं और जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। शास्त्रों में वर्णित है कि जो भक्त सच्ची निष्ठा से इस दिन गणेश पूजन करते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। धर्म, व्रत और त्योहारों की संपूर्ण जानकारी के लिए यहां क्लिक करें: धर्म, व्रत और त्योहारों की संपूर्ण जानकारी के लिए यहां क्लिक करें

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

प्राचीन काल में, एक धर्मपरायण राजा थे जिनका नाम सत्यव्रत था। वे अत्यंत ज्ञानी और प्रजापालक थे, परंतु उनके जीवन में संतान सुख का अभाव था। इस बात को लेकर वे और उनकी रानी सदैव चिंतित रहते थे। एक दिन, उनके राज्य में एक महान ऋषि का आगमन हुआ। राजा सत्यव्रत ने श्रद्धापूर्वक ऋषि का स्वागत किया और अपनी व्यथा सुनाई।

ऋषि ने ध्यान लगाकर देखा और बताया कि हे राजन, आपके पूर्व जन्म के कर्मों के कारण आपको यह कष्ट भोगना पड़ रहा है। उन्होंने राजा को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने की सलाह दी। ऋषि ने कहा कि इस व्रत के प्रभाव से भगवान गणेश का द्विजप्रिय स्वरूप प्रसन्न होता है, जो ज्ञान, बुद्धि और संतान सुख प्रदान करने वाले हैं। इस व्रत को पूर्ण विधि-विधान से करने पर आपकी इच्छा अवश्य पूर्ण होगी।

राजा और रानी ने ऋषि की आज्ञा का पालन किया और पूर्ण श्रद्धा के साथ द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा। उन्होंने विधि-विधान से भगवान गणेश की उपासना की, चंद्रदेव को अर्घ्य दिया और पूरी रात जागरण किया। उनके अटूट विश्वास और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान गणेश ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दिया।

भगवान गणेश के आशीर्वाद से कुछ समय बाद रानी ने एक अत्यंत तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। राजा और रानी की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने अपने पुत्र का नाम ‘विघ्नेश’ रखा और पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया। तभी से यह मान्यता है कि द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से भगवान गणेश अपने भक्तों के सभी संकटों का हरण करते हैं और उनकी हर इच्छा पूरी करते हैं। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा और धैर्य से किया गया व्रत कभी निष्फल नहीं होता। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि

* सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
* व्रत का संकल्प लें और एक चौकी पर भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
* गणेश जी को गंगाजल से स्नान कराएं और उन्हें दूर्वा, शमी पत्र, लाल पुष्प, अक्षत, रोली और चंदन अर्पित करें।
* मोदक या लड्डू का भोग लगाएं।
* धूप-दीप जलाकर भगवान गणेश की आरती करें।
* पूरे दिन निराहार रहकर व्रत का पालन करें।
* शाम को चंद्रोदय के समय चंद्रमा को अर्घ्य दें।
* गणेश मंत्रों का जाप करें और व्रत कथा का श्रवण करें।

भगवान गणेश का ध्यान मंत्र

> ॐ गं गणपतये नमो नमः।
> वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
> निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

निष्कर्ष एवं उपाय

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का यह पावन पर्व हमें भगवान गणेश की असीम कृपा का स्मरण कराता है। इस दिन व्रत और पूजन से न केवल संकटों का नाश होता है, बल्कि ज्ञान, बुद्धि और धन-धान्य की भी वृद्धि होती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यदि आप भी अपने जीवन में किसी बाधा से ग्रस्त हैं या किसी विशेष मनोकामना की पूर्ति चाहते हैं, तो सच्ची श्रद्धा के साथ इस व्रत को अवश्य करें। भगवान गणेश आपके सभी विघ्नों को हर लेंगे और जीवन को सुख-समृद्धि से भर देंगे।

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