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फ़रवरी, 13, 2026
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सूर्य और चंद्र ग्रहण की पौराणिक कथा: Grahan Ki Kahani

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Grahan Ki Kahani: ब्रह्मांड की हर घटना के पीछे एक गहरा आध्यात्मिक रहस्य छिपा होता है, और सूर्य व चंद्र ग्रहण भी उन्हीं में से एक हैं। इन्हें केवल एक खगोलीय परिघटना मानना हमारी आध्यात्मिक विरासत के साथ न्याय नहीं होगा। भारतीय सनातन परंपरा में ग्रहण को लेकर एक अत्यंत रोचक और महत्वपूर्ण पौराणिक कथा प्रचलित है, जिसका सीधा संबंध समुद्र मंथन से है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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सूर्य और चंद्र ग्रहण की पौराणिक कथा: Grahan Ki Kahani

समुद्र मंथन और Grahan Ki Kahani का रहस्य

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन किया, तब उसमें से 14 रत्न निकले। अंत में धन्वंतरि देव अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। इस अमृत को पीकर देवता अमर होना चाहते थे, परंतु असुर भी इस पर अपना अधिकार जमाना चाहते थे। ऐसे में भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर देवताओं और असुरों को पंक्तिबद्ध कर दिया, ताकि वे बारी-बारी से अमृत पान कर सकें।

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मोहिनी रूप में भगवान विष्णु देवताओं को अमृत पिला रहे थे, तभी एक असुर ‘स्वरभानु’ (बाद में राहु केतु के नाम से विख्यात) छल से देवताओं की पंक्ति में जा बैठा। उसने सूर्य और चंद्र देव के साथ बैठकर अमृत पान करने का प्रयास किया। जैसे ही अमृत उसके कंठ तक पहुंचा, सूर्य और चंद्र देव ने उसे पहचान लिया और तुरंत भगवान विष्णु को इसकी सूचना दी। भगवान विष्णु ने बिना विलंब किए अपने सुदर्शन चक्र से स्वरभानु का सिर धड़ से अलग कर दिया।

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परंतु तब तक स्वरभानु अमृत की कुछ बूंदें पी चुका था, जिससे उसका सिर और धड़ दोनों अमर हो गए। उसका सिर ‘राहु’ और धड़ ‘केतु’ कहलाया। चूंकि सूर्य और चंद्र देव ने राहु-केतु के छल का भंडाफोड़ किया था, इसलिए राहु-केतु ने उनसे शत्रुता मान ली। ऐसा माना जाता है कि इसी शत्रुता के कारण राहु-केतु समय-समय पर सूर्य और चंद्र को ग्रसते हैं, जिससे सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण लगते हैं। यह केवल एक खगोलीय घटना नहीं, बल्कि एक प्राचीन पौराणिक प्रतिशोध का परिणाम है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

ग्रहण काल में विशेष नियमों का पालन करना शुभ माना जाता है। इस दौरान जप-तप और ध्यान करने से आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं। साथ ही, ग्रहण के दुष्प्रभाव से बचने के लिए कई उपाय भी किए जाते हैं। धार्मिक दृष्टि से यह समय आत्मचिंतन और दान-पुण्य के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।

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ग्रहण की यह कथा हमें बताती है कि कैसे ब्रह्मांड में हर क्रिया-प्रतिक्रिया का अपना महत्व है। सूर्य और चंद्र ग्रहण केवल अंधकार का क्षण नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागृति और कर्मों के फल से जुड़ने का एक अवसर भी प्रदान करते हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। ग्रहण के बाद स्नान और दान अवश्य करना चाहिए, जिससे नकारात्मक ऊर्जा का शमन होता है और जीवन में सकारात्मकता आती है। यह कथा हमें यह भी सिखाती है कि छल और कपट का परिणाम अंततः बुरा ही होता है, भले ही क्षणिक लाभ क्यों न मिल जाए।

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