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फ़रवरी, 26, 2026
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होलिका दहन 2026: जानिए चंद्रग्रहण, भद्रा काल और शुभ समय का रहस्य

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Holika Dahan: फाल्गुन पूर्णिमा का पावन पर्व हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। यह तिथि बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक होलिका दहन और रंगों के त्योहार होली से जुड़ी है। वर्ष 2026 में, फाल्गुन पूर्णिमा पर चंद्रग्रहण का संयोग बन रहा है, जिससे भक्तों के मन में कई प्रश्न उठ रहे हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। क्या इस दौरान होलिका दहन करना शुभ होगा? सूतक काल का प्रभाव क्या रहेगा और होली खेलने का सही समय क्या होगा? आइए इन सभी ज्योतिषीय मान्यताओं को विस्तार से जानते हैं।

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होलिका दहन 2026: जानिए चंद्रग्रहण, भद्रा काल और शुभ समय का रहस्य

भारतवर्ष में होली का पर्व फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि को होलिका दहन के साथ ही आरम्भ हो जाता है। यह बुराई पर अच्छाई, असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। होलिका दहन की लौ अंधकार को चीरकर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। हर वर्ष यह पर्व पारंपरिक उत्साह और धार्मिक श्रद्धा के साथ मनाया जाता है, लेकिन वर्ष 2026 में, फाल्गुन पूर्णिमा पर चंद्रग्रहण का दुर्लभ संयोग इसे और भी महत्वपूर्ण बना रहा है। इस स्थिति में, होलिका दहन की शुभता, चंद्रग्रहण का सूतक काल और भद्रा का प्रभाव समझना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।

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होलिका दहन 2026: चंद्रग्रहण और सूतक काल की स्थिति

वर्ष 2026 में, 3 मार्च को फाल्गुन पूर्णिमा के दिन चंद्रग्रहण का योग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण दोनों के समय सूतक काल प्रभावी होता है, जिसमें शुभ कार्यों को वर्जित माना जाता है। सूतक काल में पूजा-पाठ, भोजन बनाना या खाना और अन्य मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। मंदिरों के कपाट भी बंद कर दिए जाते हैं। चूंकि होलिका दहन भी एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है, तो इस विशेष परिस्थिति में इसके आयोजन को लेकर संशय उत्पन्न होना स्वाभाविक है। हालांकि, ज्योतिषीय गणनाएं और धार्मिक ग्रंथ इस संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश देते हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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ज्योतिषीय मान्यताएं बताती हैं कि चंद्रग्रहण का सूतक काल ग्रहण लगने से 9 घंटे पूर्व आरम्भ हो जाता है। ऐसे में, यदि होलिका दहन का समय सूतक काल के दौरान आता है, तो इसे टालना ही उचित माना जाता है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, होलिका दहन हमेशा भद्रा रहित काल में ही किया जाता है, क्योंकि भद्रा को अशुभ माना गया है और इसमें कोई भी शुभ कार्य करने से बचने की सलाह दी जाती है। यदि फाल्गुन पूर्णिमा पर भद्रा और सूतक दोनों एक साथ हों, तो ऐसे में विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है।

भद्रा का प्रभाव और होलिका दहन की सही विधि

होलिका दहन के लिए फाल्गुन पूर्णिमा पर प्रदोष काल में भद्रा रहित मुहूर्त को ही सबसे शुभ माना जाता है। यदि भद्रा का मुख या पूंछ का समय होलिका दहन के समय पड़ रहा हो और साथ ही चंद्रग्रहण का सूतक भी प्रभावी हो, तो ऐसे में ज्योतिषियों से परामर्श लेकर ही उचित निर्णय लेना चाहिए। सामान्यतः, सूतक और भद्रा दोनों के समाप्त होने के बाद ही होलिका दहन करना श्रेयस्कर होता है।

होलिका दहन की सरल पूजा विधि

* सबसे पहले होलिका दहन स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें।
* होलिका के चारों ओर कच्चे सूत के धागे को 3 या 7 बार लपेटें।
* होलिका पर रोली, अक्षत, फूल, गुलाल, बताशे, कंडे की माला, नई फसल (गेंहू की बालियां, चने) आदि अर्पित करें।
* एक जल का कलश भी अर्पित करें।
* अंत में भगवान नरसिंह का ध्यान करें और अग्नि प्रज्ज्वलित करें।

ॐ प्रह्लादाय नमः
ॐ नरसिंहाय नमः

होलिका दहन के पश्चात् अग्नि की परिक्रमा करना और उसमें अपनी सभी नकारात्मकताओं को समर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। होलिका की अग्नि की राख को घर लाना भी समृद्धि और शांति का प्रतीक माना जाता है।

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निष्कर्ष और उपाय

वर्ष 2026 में होलिका दहन और चंद्रग्रहण का यह दुर्लभ संयोग हमें प्रकृति के नियमों और ज्योतिषीय मान्यताओं का सम्मान करने की सीख देता है। ऐसी स्थिति में, किसी भी प्रकार के संशय को दूर करने के लिए अनुभवी ज्योतिषी से सलाह लेना बुद्धिमानी होगी। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। सामान्यतः, यदि चंद्रग्रहण और सूतक काल होलिका दहन के शुभ मुहूर्त में बाधक बन रहे हों, तो इनके समाप्त होने का धैर्यपूर्वक इंतज़ार करना चाहिए। होलिका दहन सदैव भद्रा रहित और सूतक मुक्त काल में ही करना चाहिए, ताकि इसका पूर्ण पुण्य लाभ प्राप्त हो सके और जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहे। इस दौरान भगवान विष्णु और नरसिंह भगवान की आराधना करना विशेष फलदायी होता है।

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