



धर्म डेस्क: साल की आखिरी कालाष्टमी बस कुछ ही दिनों में आने वाली है और इसके साथ ही भक्तों को भगवान काल भैरव की विशेष कृपा प्राप्त करने का एक अद्भुत अवसर मिलेगा। पौष मास में पड़ने वाला यह दिन न केवल आध्यात्मिक महत्व रखता है, बल्कि इसे भय, बाधाओं और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति दिलाने वाला भी माना जाता है। तो आखिर कब है यह महत्वपूर्ण तिथि और कैसे आप भी पा सकते हैं महादेव के इस रौद्र रूप का आशीर्वाद? आइए जानते हैं…
क्या है कालाष्टमी और भगवान काल भैरव का स्वरूप?
प्रत्येक चंद्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी के रूप में मनाया जाता है। यह दिन भगवान शिव के रौद्र रूप, काल भैरव को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि इसी दिन भगवान काल भैरव का प्राकट्य हुआ था। भगवान काल भैरव को तंत्र-मंत्र के देवता और दुष्टों का संहारक माना जाता है। इनकी पूजा करने से व्यक्ति को शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है, भय से मुक्ति मिलती है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं। इन्हें क्षेत्रपाल भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है क्षेत्र का रक्षक।
पौष मास की अंतिम कालाष्टमी का विशेष महत्व
साल 2025 की अंतिम कालाष्टमी पौष मास में पड़ रही है, जिसे अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है। पौष मास आध्यात्मिक कार्यों और दान-पुण्य के लिए विशेष महत्व रखता है। ऐसे में इस मास में आने वाली कालाष्टमी का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस दिन की गई पूजा और व्रत से मिलने वाले पुण्य का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है। भक्त इस विशेष अवसर पर भगवान काल भैरव की आराधना कर अपने जीवन से नकारात्मक शक्तियों को दूर करते हैं और सकारात्मकता का संचार करते हैं।
भय, बाधाओं और नकारात्मक ऊर्जा से पाएं मुक्ति
भगवान काल भैरव की उपासना भय से मुक्ति दिलाने वाली मानी जाती है। जो भक्त सच्चे मन से उनकी पूजा करते हैं, उन्हें किसी भी प्रकार का डर परेशान नहीं करता। इसके साथ ही, जीवन में आने वाली हर प्रकार की बाधाएं और रुकावटें भी दूर होती हैं। कालाष्टमी पर काल भैरव की आराधना से व्यक्ति के आसपास मौजूद नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और घर में सुख-शांति का वास होता है। पितृदोष और कालसर्प दोष जैसी समस्याओं से मुक्ति के लिए भी इस दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
कालाष्टमी व्रत विधि और पूजा का तरीका
कालाष्टमी के दिन भक्त सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। इसके बाद भगवान काल भैरव का स्मरण कर व्रत का संकल्प लेते हैं। इस दिन पूरे विधि-विधान से भगवान काल भैरव की पूजा की जाती है। उनकी प्रतिमा या तस्वीर स्थापित कर गंगाजल से अभिषेक किया जाता है। उन्हें नीले फूल, अक्षत, सिंदूर, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। इस दिन भैरव चालीसा का पाठ और भैरव मंत्रों का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। रात के समय जागरण कर भगवान काल भैरव की कथा सुनना और आरती करना भी लाभकारी होता है। पूजा के बाद गरीबों और जरूरतमंदों को दान-पुण्य करना चाहिए।
पौष मास की यह अंतिम कालाष्टमी भक्तों के लिए भगवान काल भैरव का आशीर्वाद प्राप्त करने का एक सुनहरा अवसर है। इस दिन सच्ची श्रद्धा और निष्ठा से की गई पूजा-अर्चना व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाती है, तथा उसे हर प्रकार के भय और बाधाओं से मुक्ति प्रदान करती है।


