



Mahashivratri 2026: हर वर्ष शिव भक्तों द्वारा अत्यंत श्रद्धा और भक्तिभाव से मनाया जाने वाला महापर्व महाशिवरात्रि, भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक है। यह वह पवित्र दिवस है जब देवों के देव महादेव सृष्टि के कल्याण हेतु अनेक लीलाएँ रचते हैं। यह सिर्फ एक पर्व नहीं, अपितु आत्मा के शुद्धिकरण और परमात्मा से एकाकार होने का एक स्वर्णिम अवसर है।
महाशिवरात्रि 2026: क्यों मनाई जाती है यह पावन रात्रि और क्या है इसका रहस्य?
महाशिवरात्रि 2026 के इस पावन अवसर पर आइए जानते हैं कि आखिर क्यों सनातन धर्म में इस रात्रि को इतनी महत्ता दी गई है और इसके पीछे कौन-कौन सी पौराणिक कथाएँ छिपी हैं। यह लेख आपके मन में उठ रहे उन सभी प्रश्नों का समाधान करेगा जो इस महापर्व की उत्पत्ति से जुड़े हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। धर्म, व्रत और त्योहारों की संपूर्ण जानकारी के लिए यहां क्लिक करें: धर्म, व्रत और त्योहारों की संपूर्ण जानकारी के लिए यहां क्लिक करें
महाशिवरात्रि 2026 की पौराणिक कथाएँ: शिव-पार्वती विवाह और शिवलिंग का प्राकट्य
महाशिवरात्रि का पर्व कई महत्वपूर्ण पौराणिक घटनाओं से जुड़ा हुआ है। इनमें से दो प्रमुख कथाएँ हैं: भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह तथा भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग स्वरूप का प्राकट्य।
शिव-पार्वती विवाह
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी को ही भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। यह दिन शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक है, जो सृष्टि में संतुलन और harmony को दर्शाता है। माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इस दिन उनसे विवाह किया। इसी कारण, विवाहित स्त्रियाँ अपने सुखी दांपत्य जीवन के लिए और अविवाहित कन्याएँ योग्य वर प्राप्ति के लिए महाशिवरात्रि का व्रत रखती हैं। यह पावन पर्व प्रेम, त्याग और समर्पण का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है।
ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य
एक अन्य कथा के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच अपनी श्रेष्ठता को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया था। तब एक विशालकाय, अनंत प्रकाश स्तंभ पृथ्वी और आकाश के बीच प्रकट हुआ। यह प्रकाश स्तंभ इतना विशाल था कि इसका न तो आदि था और न ही अंत। तब ब्रह्मा और विष्णु दोनों ने इसके छोर का पता लगाने का निर्णय लिया। भगवान ब्रह्मा हंस का रूप धरकर ऊपर की ओर गए और भगवान विष्णु वराह का रूप धरकर नीचे की ओर गए, लेकिन दोनों ही इसके छोर का पता लगाने में असफल रहे। अंततः उन्हें यह ज्ञात हुआ कि यह प्रकाश स्तंभ स्वयं भगवान शिव का विराट स्वरूप है। इसी दिन पहली बार भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे। यह घटना दर्शाती है कि भगवान शिव ही परम सत्ता हैं और वे ही इस संपूर्ण सृष्टि के रचयिता, पालक और संहारक हैं। इसी दिन भगवान शिव के अनादि और अनंत स्वरूप शिवलिंग की पूजा का विशेष महत्व है।
आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इन कथाओं का श्रवण और मनन करने से भक्तों को आध्यात्मिक शांति मिलती है और वे भगवान शिव के प्रति अपनी श्रद्धा को और भी गहरा कर पाते हैं।
महाशिवरात्रि व्रत और पूजा विधि
महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है। इस दिन व्रत रखने और विधि-विधान से पूजा करने से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
- प्रातःकाल उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र करें और भगवान शिव का ध्यान करें।
- एक थाली में जल, दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल, बेलपत्र, धतूरा, भांग, सफेद चंदन, फूल, फल, अक्षत आदि सामग्री एकत्र करें।
- शिवलिंग पर क्रमशः जल, दूध, दही, घी, शहद, फिर जल चढ़ाकर अभिषेक करें। इसे पंचामृत अभिषेक कहते हैं।
- बेलपत्र, धतूरा, भांग, आक के फूल, सफेद पुष्प और फल अर्पित करें।
- धूप, दीप जलाकर आरती करें।
- महामृत्युंजय मंत्र या शिव पंचाक्षर मंत्र का जप करें।
- रात्रि में जागरण करें और शिव कथाओं का श्रवण करें या शिव भजन गाएं।
महाशिवरात्रि का फल और उपाय
महाशिवरात्रि का व्रत अत्यंत फलदायी माना जाता है। इस दिन व्रत रखने और भगवान शिव की पूजा करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है, कष्ट दूर होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
ॐ नमः शिवाय।
जो भक्त पूरी श्रद्धा और भक्तिभाव से इस दिन भगवान शिव का स्मरण करते हैं, उनके जीवन में सुख-समृद्धि आती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इस दिन सुबह शिवलिंग पर एक लोटा जल अर्पित कर ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का 108 बार जप करने से सभी बाधाएँ दूर होती हैं और मनचाही इच्छाएँ पूर्ण होती हैं।



