



Pradosh Vrat: हर मास की त्रयोदशी तिथि भगवान शिव को समर्पित होती है, जिसे प्रदोष व्रत के नाम से जाना जाता है। इस पावन दिन पर जो भक्त सच्चे मन से भगवान शिव और माता पार्वती की उपासना करते हैं, उनके जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। विशेषकर संध्याकाल में शिवजी की आरती का बड़ा महत्व है, जो पूजा को संपूर्णता प्रदान करती है।
प्रदोष व्रत पर करें शिव जी की आरती: मिलेगा अखंड सौभाग्य और सुख-शांति
प्रदोष व्रत: आरती का महत्व और विधि
हर मास की त्रयोदशी तिथि भगवान शिव को समर्पित होती है, जिसे प्रदोष व्रत के नाम से जाना जाता है। इस पावन दिन पर जो भक्त सच्चे मन से भगवान शिव और माता पार्वती की उपासना करते हैं, उनके जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। विशेषकर संध्याकाल में शिवजी की आरती का बड़ा महत्व है, जो पूजा को संपूर्णता प्रदान करती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। शास्त्रों में वर्णित है कि प्रदोष काल में भगवान शिव अपने पूर्ण स्वरूप में कैलाश पर्वत पर नृत्य करते हैं, इसीलिए इस समय की गई पूजा अत्यधिक फलदायी होती है। आरती के माध्यम से भक्त अपने आराध्य महादेव के प्रति अपनी श्रद्धा और प्रेम व्यक्त करते हैं। यह मात्र एक क्रिया नहीं, अपितु भक्ति का वह प्रवाह है जो सीधे आत्मा से जुड़ता है। इस पवित्र दिन पर की गई शिव आरती से घर में सुख-समृद्धि का वास होता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। धर्म, व्रत और त्योहारों की संपूर्ण जानकारी के लिए यहां क्लिक करें
शिव आरती का अनुपम महत्व
प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव की आरती करना न केवल पूजा को पूर्ण करता है, बल्कि यह भक्तों के मन को भी शांति प्रदान करता है। आरती के दौरान बजने वाले घंटे-घड़ियाल और दीपों की जगमगाहट एक दिव्य वातावरण का निर्माण करती है, जिसमें भक्त स्वयं को पूरी तरह से महादेव के चरणों में समर्पित कर पाता है। ऐसा माना जाता है कि आरती के माध्यम से देवताओं की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है और समस्त पापों का नाश होता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
भगवान शिव जी की आरती
जय शिव ओंकारा, ॐ जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥एकानन चतुरानन, पंचानन राजे।
हंसानन गरुड़ासन, वृषवाहन साजे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥दो भुज चार चतुर्भुज, दस भुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते, त्रिभुवन जन मोहे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥अक्षमाला वनमाला, मुंडमाला धारी।
त्रिपुरारी कंसारी, कर माला धारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥श्वेताम्बर पीताम्बर, बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक, भूतादिक संगे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥कर के मध्य कमंडलु, चक्र त्रिशूलधारी।
सुखकारी दुखहारी, जगपालन कारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये, ये तीनों एका॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥त्रिगुण स्वामी जी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
निष्कर्ष एवं उपाय
प्रदोष व्रत के दिन सच्ची श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान शिव की आरती करने से भक्तों के सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। यह आरती न केवल पूजा का समापन है, बल्कि यह ईश्वर के प्रति हमारे समर्पण का भी प्रतीक है। आरती के उपरांत भगवान से प्रार्थना करें और प्रसाद वितरण करें। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।


