Premanand Ji Maharaj: सनातन संस्कृति में गुरुजनों और अग्रजों के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद ग्रहण करना एक अत्यंत पवित्र और सम्मानजनक परंपरा रही है, जो सदियों से हमारे समाज का अभिन्न अंग है। परंतु, क्या यह सत्य है कि ऐसा करने से आशीर्वाद देने वाले के पुण्य का क्षय होता है? इस गंभीर प्रश्न पर वृदांवन के संत शिरोमणि प्रेमानंद जी महाराज ने अपने दिव्य वचनों से एक गहन मार्गदर्शन प्रदान किया है, जिसे जानना प्रत्येक जिज्ञासु के लिए आवश्यक है।
Premanand Ji Maharaj: क्या चरण स्पर्श से घटता है गुरुजनों का पुण्य? जानें प्रेमानंद महाराज का दिव्य मार्गदर्शन
भारतवर्ष में बड़ों और गुरुजनों के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रथा आदिकाल से चली आ रही है। यह न केवल आदर और श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि यह एक प्रकार से ऊर्जा के सकारात्मक संचार का माध्यम भी माना जाता है। किंतु, कुछ लोगों के मन में यह संशय उत्पन्न होता है कि क्या इस प्रक्रिया में आशीर्वाद देने वाले व्यक्ति के संचित पुण्य का कुछ अंश घट जाता है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए, प्रेमानंद जी महाराज ने अपनी गहन आध्यात्मिक दृष्टि से इस अवधारणा को स्पष्ट किया है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
Premanand Ji Maharaj के अनुसार चरण स्पर्श का वास्तविक अर्थ
प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, जब कोई शिष्य या छोटा व्यक्ति पूरी श्रद्धा और नम्रता के साथ किसी गुरु या बड़े-बुजुर्ग के चरण स्पर्श करता है, तो यह कृत्य मात्र एक शारीरिक क्रिया नहीं, अपितु आत्मा का आत्मा से जुड़ाव है। गुरु या बड़े व्यक्ति का पुण्य कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो किसी के चरण छूने से घट जाए। वास्तव में, आशीर्वाद देना तो प्रेम, करुणा और दिव्यता का प्रवाह है। एक सच्चा गुरु या स्नेही बुजुर्ग जब किसी को आशीर्वाद देता है, तो वह अपने भीतर की सकारात्मक ऊर्जा और ईश्वर प्रदत्त कृपा को प्रवाहित करता है, जिससे उसके स्वयं का पुण्य घटने के बजाय और बढ़ता है। यह एक ऐसा दान है जो दाता को और समृद्ध करता है। गुरुजनों के लिए यह प्रसन्नता का विषय होता है कि उनके शिष्य या संतान उनके प्रति आदर भाव रखते हैं।
महाराज श्री बताते हैं कि, पुण्य का नाश उन कर्मों से होता है जो धर्म के विरुद्ध हों, जिसमें अहंकार हो, या किसी का अहित करने का भाव हो। निःस्वार्थ भाव से दिया गया आशीर्वाद, जिसमें देने वाले के मन में कोई अपेक्षा न हो और लेने वाले के मन में पूर्ण श्रद्धा हो, कभी भी पुण्य का क्षय नहीं करता। इसके विपरीत, यह दोनों के लिए कल्याणकारी सिद्ध होता है। बड़े-बुजुर्गों को चाहिए कि वे निस्वार्थ भाव से अपने छोटों को आशीर्वाद दें और छोटे पूरी श्रद्धा से उनका आदर करें। इस पवित्र क्रिया में किसी के पुण्य का नाश नहीं होता, बल्कि प्रेम और सद्भाव का विस्तार होता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह एक शाश्वत सत्य है कि गुरु का आशीर्वाद अमोघ होता है और वह सदैव अपने शिष्यों का कल्याण ही चाहता है। गुरु के लिए शिष्य का सम्मान ही उसका वास्तविक पुण्य है।
धर्म, व्रत और त्योहारों की संपूर्ण जानकारी के लिए यहां क्लिक करें: धर्म, व्रत और त्योहारों की संपूर्ण जानकारी के लिए यहां क्लिक करें
निष्कर्ष एवं उपाय:
अतः, प्रेमानंद जी महाराज का स्पष्ट संदेश है कि गुरुजनों या बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श करने से उनके पुण्य का नाश नहीं होता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह तो एक पवित्र परंपरा है जो आदर, प्रेम और सकारात्मक ऊर्जा के आदान-प्रदान को बढ़ावा देती है। सभी को निर्भीक होकर अपने बड़ों का सम्मान करना चाहिए और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। गुरुजनों को भी चाहिए कि वे अपने शिष्यों को सदैव प्रेम और करुणा के साथ आशीर्वाद दें, क्योंकि यही सनातन धर्म की सच्ची शिक्षा है।




