



Premanand Ji Maharaj: संत शिरोमणि प्रेमानंद जी महाराज के वचनामृत जीवन के हर पड़ाव पर प्रकाश डालते हैं, विशेषकर छात्र जीवन पर। यह वह समय है जब एक व्यक्ति का भविष्य गढ़ा जाता है, चरित्र का निर्माण होता है और जीवन भर साथ रहने वाली आदतों का रोपण होता है। इस महत्वपूर्ण कालखंड में कुछ ऐसी बातें भी घर कर जाती हैं, जिनका प्रभाव आजीवन रहता है। महाराज श्री ने छात्रों की कुछ आदतों पर चिंता व्यक्त करते हुए उनके गंभीर परिणामों पर प्रकाश डाला है।
प्रेमानंद जी महाराज: छात्रों के जीवन में संस्कारों का महत्व और वाणी शुद्धि का दिव्य संदेश
Premanand Ji Maharaj के दिव्य वचन और छात्र जीवन की चुनौतियाँ
छात्र जीवन मनुष्य के लिए नव निर्माण का काल होता है। यह वह स्वर्णिम अवसर होता है जब व्यक्ति न केवल शिक्षा ग्रहण करता है, अपितु नए गुणों को अपनाता है, स्वयं को नई आदतों के साँचे में ढालता है। इस काल की सीख और आचरण हमारे संपूर्ण जीवन पर गहरा प्रभाव डालते हैं, चाहे वह हमारे व्यवहार में परिलक्षित हो या हमारी संवाद शैली में। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। किंतु, विडंबना यह है कि यही वह समय भी होता है जब छात्र कभी-कभी अनजाने में गलत आदतों को भी अपना लेते हैं। ऐसे में यदि किसी छात्र को गाली या अभद्र भाषा का प्रयोग करने की आदत लग जाए, तो उसका भविष्य और व्यक्तित्व किस दिशा में जाएगा?
पूज्य संत प्रेमानंद जी महाराज ने इस विषय पर अपनी गंभीर चिंता व्यक्त की है। उनके अनुसार, वाणी मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण है और इसका संयमित एवं शुद्ध प्रयोग व्यक्ति के आंतरिक संस्कारों का परिचायक होता है। छात्र जीवन में अपशब्दों का प्रयोग करना या गाली गलौज की आदत डालना एक अत्यंत विनाशकारी पथ की ओर ले जाता है। यह न केवल व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुँचाता है, बल्कि उसके मन और मस्तिष्क को भी दूषित करता है। यह आदत धीरे-धीरे व्यक्ति के अंतर्मन को कठोर बना देती है, जिससे उसकी संवेदनशीलता समाप्त होने लगती है। महाराज श्री का स्पष्ट मत है कि ऐसी आदतें छात्र के उज्ज्वल भविष्य के द्वार बंद कर देती हैं।
वे कहते हैं कि छात्र को अपनी शिक्षा के साथ-साथ अपनी वाणी पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। शुद्ध और शालीन भाषा का प्रयोग व्यक्ति को समाज में सम्मान दिलाता है और उसके भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। यह नैतिक शिक्षा का अभिन्न अंग है कि हम अपनी भाषा पर नियंत्रण रखें और क्रोध अथवा उत्तेजना में भी अपशब्दों का प्रयोग न करें। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। माता-पिता और गुरुजनों का भी यह दायित्व है कि वे छात्रों को बचपन से ही वाणी की शुद्धि और उसके महत्व से अवगत कराएँ।
गाली देने की आदत व्यक्ति के चरित्र को कमजोर करती है और उसके आस-पास के वातावरण को भी नकारात्मक बनाती है। प्रेमानंद जी महाराज ने समझाया है कि जैसे एक छोटा सा बीज विशाल वृक्ष बन जाता है, वैसे ही छात्र जीवन की छोटी सी आदतें भविष्य में बड़े परिणाम लेकर आती हैं। यदि छात्र अपनी ऊर्जा को शिक्षा और सकारात्मक क्रियाकलापों में लगाते हैं, तो वे न केवल स्वयं का, बल्कि समाज का भी उत्थान करते हैं।
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अंततः, प्रेमानंद जी महाराज का संदेश स्पष्ट है कि छात्रों को अपने जीवन के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर वाणी की पवित्रता और संस्कारों के महत्व को समझना चाहिए। अपशब्दों का त्याग कर सद्भावनापूर्ण और मधुर वाणी अपनाना ही उनके सर्वांगीण विकास का मार्ग है। उपाय के तौर पर, छात्रों को प्रतिदिन कुछ समय ध्यान में व्यतीत करना चाहिए, जिससे मन शांत हो और वाणी में मधुरता आए। साथ ही, अच्छे साहित्य का अध्ययन और सत्संग में भागीदारी भी वाणी शुद्धि में सहायक सिद्ध होती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

