



Premanand Ji Maharaj Updesh: सद्गुरु प्रेमानंद जी महाराज, जो अपनी दिव्य वाणी और गहन आध्यात्मिक ज्ञान के लिए जग विख्यात हैं, उनके पावन सानिध्य में एक जिज्ञासु भक्त ने अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न रखा। यह प्रश्न मानव जीवन की सबसे बड़ी पहेली, ‘भाग्य’ से जुड़ा था। भक्त ने पूछा, “महाराज, क्या केवल नाम या मोबाइल नंबर बदल लेने से अथवा कोई रत्न जड़ित अंगूठी धारण कर लेने से मनुष्य का भाग्य परिवर्तित हो जाता है?” इस प्रश्न पर गुरुदेव का उत्तर समस्त सांसारिक भ्रमों को दूर करने वाला था, जो हमें कर्म के गूढ़ सिद्धांत से परिचित कराता है।
Premanand Ji Maharaj Updesh: क्या नाम, नंबर या अंगूठी बदलने से बदलती है किस्मत?
Premanand Ji Maharaj Updesh: गुरुदेव प्रेमानंद जी का आध्यात्मिक मार्गदर्शन
“इस संसार में प्रत्येक जीव अपने कर्मों के फलानुसार ही जीवन यात्रा तय करता है। नाम बदलना, नंबर बदलना या किसी रत्न को धारण करना मात्र बाहरी बदलाव हैं। इनका आंतरिक जीवन और भाग्य के मूल स्वरूप पर कोई गहरा प्रभाव नहीं पड़ता,” प्रेमानंद जी महाराज ने शांत भाव से समझाया। वेदों और शास्त्रों में भी ‘कर्म’ को ही प्रधान बताया गया है। व्यक्ति का भाग्य उसके पूर्व संचित कर्मों और वर्तमान में किए जा रहे पुरुषार्थ का ही परिणाम है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
गुरुदेव ने आगे कहा, “यदि कोई व्यक्ति अपने नाम या संख्या को बदलता है, तो इससे उसकी मानसिक संतुष्टि हो सकती है, परंतु इससे उसके जीवन की दिशा और नियति में वास्तविक परिवर्तन नहीं आता। भाग्य का चक्र कर्मों के आधार पर ही घूमता है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि ज्योतिषीय समाधान या रत्नों का प्रभाव केवल तभी होता है जब वे हमारे कर्मों में सहायक बनें, न कि उन्हें बदलने का दावा करें। “सच्चा परिवर्तन तब आता है जब हम अपनी सोच, अपने दृष्टिकोण और अपने कर्मों में शुद्धि लाते हैं।”
प्रेमानंद जी महाराज ने भक्त को यह भी समझाया कि बाहरी आडंबरों के बजाय आत्म-चिंतन और सत्कर्मों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। “अपने भीतर झांकिए, अपने दोषों को पहचानिए और उन्हें सुधारने का प्रयास कीजिए। यही सच्चा मार्ग है भाग्य को बदलने का।” उन्होंने कहा कि परमात्मा ने हमें यह मानव जीवन अपनी इच्छाशक्ति और विवेक के साथ दिया है, ताकि हम सही दिशा में कर्म करके अपने जीवन को सार्थक बना सकें। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। सच्चा भाग्य तभी चमकता है जब हम निस्वार्थ भाव से सेवा करते हैं और धर्म के मार्ग पर चलते हैं।
निष्कर्ष
गुरुदेव प्रेमानंद जी महाराज के इन वचनों से यह स्पष्ट होता है कि हमारे भाग्य का निर्माण हमारे कर्मों से होता है। नाम, नंबर या अंगूठी मात्र निमित्त हो सकते हैं, परंतु वे स्वयं भाग्य के निर्माता नहीं हैं। हमें अंधविश्वासों से दूर रहकर सत्य और धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए। अपने कर्म फल को सुधारने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहना ही वास्तविक आध्यात्मिक उन्नति है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
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