त्योहार मनाना: भारतीय संस्कृति में पर्वों का विशेष महत्व है, जो जीवन में हर्ष, उल्लास और आध्यात्मिकता का संचार करते हैं। परंतु, कई बार ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं जब हमें यह विचार विचलित करने लगता है कि यदि किसी शुभ पर्व के दिन घर में किसी सदस्य का निधन हो जाए, तो क्या उस त्योहार को पुनः मनाना उचित है या नहीं? यह एक ऐसा प्रश्न है जो अनेक श्रद्धालुओं के मन में असमंजस पैदा करता है। इस विषय पर गहन मार्गदर्शन के लिए, आइए जानते हैं परम पूज्य प्रेमानंद जी महाराज के दिव्य वचनों को, जो हमें शास्त्रों की सही समझ और धार्मिक मान्यताओं का स्पष्टीकरण प्रदान करते हैं।
त्योहार मनाना: प्रेमानंद जी महाराज का क्या है दिव्य मार्गदर्शन?
मृत्यु के उपरांत त्योहार मनाना: शास्त्रों का मत और प्रेमानंद जी का समाधान
मान्यता है कि यदि किसी पर्व विशेष के दिन परिवार में किसी प्रियजन का निधन हो जाए, तो उस त्योहार को आने वाले वर्षों में नहीं मनाया जाना चाहिए। लेकिन क्या यह धारणा वास्तव में हमारी प्राचीन धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है या यह केवल एक सामाजिक भ्रांति है? परम पूज्य संत प्रेमानंद जी महाराज इस संबंध में बहुत ही स्पष्ट और तार्किक उत्तर देते हैं, जो हमें अज्ञानता के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। महाराज श्री कहते हैं कि किसी व्यक्ति की मृत्यु एक अटल सत्य है और हर जीव को इस संसार से जाना ही है। मृत्यु के बाद घर में सूतक लगता है, और इस अवधि में शुभ कार्य वर्जित होते हैं। परंतु, सूतक की अवधि समाप्त होने के बाद, त्योहारों को पुनः मनाना पूर्णतः उचित है।
प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि त्योहार हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग हैं और ये हमें सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करते हैं। किसी प्रियजन के जाने का दुख स्वाभाविक है, लेकिन उस दुख को त्योहार न मनाने का बहाना बनाकर हम अपने जीवन से खुशियों को दूर नहीं कर सकते। वे स्पष्ट करते हैं कि शास्त्रों में ऐसा कोई विधान नहीं है जो यह कहता हो कि यदि किसी पर्व के दिन घर में मृत्यु हो जाए तो उस त्योहार को भविष्य में कभी न मनाया जाए। यह केवल एक लोक परंपरा हो सकती है जो समय के साथ विकसित हुई है, लेकिन इसका कोई शास्त्रीय आधार नहीं है।
महाराज श्री जोर देते हैं कि हमें शास्त्रों और धर्मग्रंथों में वर्णित सही नियमों का पालन करना चाहिए, न कि केवल सुनी-सुनाई बातों का। जीवन और मृत्यु ईश्वर की इच्छा पर निर्भर करते हैं। यदि आपके मन में किसी त्योहार को लेकर कोई संशय है, तो श्रद्धाभाव से उस त्योहार को मनाना चाहिए, क्योंकि इससे मन को शांति और सकारात्मकता मिलती है। हमें अपने दुखों को पीछे छोड़कर जीवन के हर पल में ईश्वर का स्मरण करते हुए आगे बढ़ना चाहिए। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
अतः, प्रेमानंद जी महाराज के वचनों से यह स्पष्ट होता है कि पर्व के दिन घर में मृत्यु होने पर भी सूतक काल समाप्त होने के बाद त्योहारों को मनाना पूर्णतः धर्मसम्मत है। हमें अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए और स्वयं के जीवन में भी सकारात्मकता बनाए रखनी चाहिए। दुखों को भुलाकर नहीं, बल्कि उन्हें स्वीकार कर आगे बढ़ना ही सच्चा जीवन है। त्योहार हमें यह अवसर देते हैं कि हम सामूहिक रूप से खुशियों का आदान-प्रदान करें और ईश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करें।
उपाय: यदि मन में फिर भी कोई संशय हो, तो सूतक के बाद घर की शुद्धि करवाकर, किसी योग्य ब्राह्मण से पितरों की शांति के लिए पूजन करवा सकते हैं। इसके उपरांत, बिना किसी संकोच के अपने सभी पर्वों को पूर्ववत मनाएं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
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