



Rameshwaram Jyotirlinga: भारत की पुण्य भूमि पर स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग, भगवान शिव के उन पवित्र धामों में से है जहाँ हर भक्त अपने जीवन में एक बार जाने की अभिलाषा रखता है। यह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, अपितु गहन आस्था और पौराणिक कथाओं का संगम है, जिसकी स्थापना स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने की थी। आज हम इस लेख में इस अद्भुत ज्योतिर्लिंग के उद्भव और उससे जुड़े रहस्यों का अनावरण करेंगे।
रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग: भगवान राम द्वारा स्थापित पावन धाम
सनातन धर्म में रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग का विशेष स्थान है। यह दक्षिण भारत का एक ऐसा तीर्थ है जहाँ भगवान राम और शिव की महिमा एकाकार हो जाती है। जब भगवान श्रीराम लंकापति रावण का वध करने के लिए समुद्र पार करने की योजना बना रहे थे, तब उन्होंने भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने का निश्चय किया। इस महान कार्य की सिद्धि के लिए शिव की आराधना अनिवार्य थी।
रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की स्थापना का पौराणिक रहस्य
यह कथा उस समय की है जब भगवान श्रीराम ने माता सीता को रावण के बंधन से मुक्त कराने के लिए लंका पर चढ़ाई करने का मन बनाया। लंका जाने से पहले उन्होंने समुद्र के तट पर शिव पूजन का संकल्प लिया। इसके लिए उन्होंने पवनपुत्र हनुमान को कैलाश पर्वत से शिवलिंग लाने का आदेश दिया। हनुमान जी शीघ्र ही शिवलिंग लाने कैलाश की ओर प्रस्थान कर गए। इधर शुभ मुहूर्त बीत रहा था और हनुमान जी को आने में विलंब हो रहा था। ऐसे में माता सीता ने भगवान राम को सलाह दी कि वे अपने हाथों से बालू का एक शिवलिंग बनाकर उसकी स्थापना करें ताकि शुभ मुहूर्त व्यर्थ न जाए। श्रीराम ने सीता जी के परामर्श पर वहीं समुद्र तट पर बालू से एक सुंदर शिवलिंग का निर्माण किया और विधि-विधान से उसकी पूजा-अर्चना की। यही शिवलिंग ‘रामलिंगम’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ और यह स्थान रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग कहलाया। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इसकी महिमा का वर्णन विभिन्न धर्मग्रंथों में मिलता है।
हनुमान जी और काशी विश्वनाथ का आगमन
जब पूजा संपन्न हो गई और भगवान श्रीराम ने अपनी यात्रा शुरू करने की तैयारी कर ली, तभी हनुमान जी कैलाश से शिवलिंग लेकर वापस लौटे। अपने विलंब के कारण उन्होंने देखा कि पूजा तो पहले ही संपन्न हो चुकी है, जिससे वे थोड़े उदास हो गए। भगवान श्रीराम ने हनुमान जी को सांत्वना दी और उनके लाए हुए शिवलिंग को भी रामलिंगम के समीप ही स्थापित करने का निर्देश दिया। हनुमान जी द्वारा लाए गए इस शिवलिंग को ‘विश्वलिंगम’ या ‘हनुमदिश्वर’ कहा गया, जो काशी विश्वनाथ का ही एक रूप माना जाता है। श्रीराम ने यह घोषणा की कि जो भी भक्त रामलिंगम के दर्शन करने आएगा, उसे पहले विश्वलिंगम की पूजा करनी होगी। यह इस पवित्र स्थल की अनूठी शिव महिमा का प्रतीक है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
रामेश्वरम की तीर्थ यात्रा का महत्व
रामेश्वरम की यात्रा को मोक्षदायिनी माना जाता है। यहाँ स्नान और पूजन करने से सभी पापों का नाश होता है और व्यक्ति को आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है। यहाँ आने वाले भक्तगण सबसे पहले धनुषकोडि में समुद्र स्नान करते हैं और उसके बाद मंदिर में प्रवेश कर भगवान शिव का दर्शन करते हैं। यह ज्योतिर्लिंग शिव और राम के मिलन का प्रतीक है, जो हमें धर्म और भक्ति की अटूट डोर का पाठ पढ़ाता है। धर्म, व्रत और त्योहारों की संपूर्ण जानकारी के लिए यहां क्लिक करें: https://deshajtimes.com/news/dharm-adhyatm/। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
निष्कर्ष और उपकार
रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक जीवंत गाथा है जो हमें भगवान राम की भक्ति, धर्मपरायणता और भगवान शिव की असीम कृपा की याद दिलाती है। यहाँ का हर कण एक दिव्य ऊर्जा से ओत-प्रोत है जो भक्तों को असीम शांति प्रदान करता है। इस पवित्र धाम की यात्रा निश्चय ही जीवन को धन्य कर देती है।



