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इंडिया 2047 Youth Conclave में गूंजी प्रेरणादायक आवाजें: सामाजिक बदलाव की कहानियाँ और युवाओं के लिए प्रेरणा

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युवाओं को देश के भविष्य से जोड़ने और उन्हें नई दिशा प्रदान करने के उद्देश्य से हाल ही में एक महत्वपूर्ण यूथ कॉन्क्लेव का आयोजन किया गया। इस विशेष कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों के दिग्गजों ने अपने अनुभव और विचारों को साझा करते हुए युवाओं को प्रेरित किया। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह मंच युवाओं को देश के भविष्य से जोड़कर उन्हें सही दिशा दिखाने का महत्वपूर्ण काम कर रहा है।

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Youth Conclave में सामाजिक बदलाव की कहानियाँ

इस कॉन्क्लेव के दौरान, समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रही संस्था गूंज के संस्थापक और निदेशक अंशु गुप्ता ने दिल को छू लेने वाले अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि कैसे एक छोटी सी सोच ने आज एक बड़े आंदोलन का रूप ले लिया है। अंशु गुप्ता ने अपने शुरुआती दिनों की एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि एक बार वे पुरानी दिल्ली की गलियों में घूम रहे थे। वहां उन्होंने एक ऐसी महिला को देखा, जिसका काम पुलिस की मदद से लावारिस शवों को उठाना था।

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उन्होंने बताया कि साल 1991 में उस महिला को इस काम के बदले केवल 20 रुपये और एक सफेद कपड़ा मिलता था। जब इस स्थिति को गहराई से समझा गया, तो एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई। गर्मियों में जहां रोज 4 से 5 शव उठाने पड़ते थे, वहीं सर्दियों में यह संख्या बढ़कर 10 से 12 तक पहुंच जाती थी। इसका मुख्य कारण ठंड नहीं, बल्कि गरीब लोगों के पास गर्म कपड़ों की कमी थी, जिसके अभाव में वे अपनी जान गंवा देते थे। यह एक ऐसी सामाजिक समस्या थी, जिसने अंशु गुप्ता को सामाजिक उद्यमिता (Social Entrepreneurship) के मार्ग पर अग्रसर किया।

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अंशु गुप्ता ने उस महिला की बेटी बानो का जिक्र करते हुए बताया कि बानो ने एक बार कहा था कि जब उसे ठंड लगती है, तो वह शव के पास जाकर चिपक जाती है, क्योंकि शव करवट नहीं बदलता। इस बात ने हर किसी का दिल भर दिया और इसी अनुभव ने अंशु गुप्ता की सोच को पूरी तरह बदल दिया। यहीं से ‘गूंज’ की नींव पड़ी, जो आज लाखों लोगों के जीवन में बदलाव ला रही है।

उन्होंने बताया कि गूंज की शुरुआत मात्र 67 कपड़ों से हुई थी। आज इस संस्था को काम करते हुए 27 साल हो चुके हैं। अंशु गुप्ता ने कहा कि जब हम किसी को पुराने कपड़े या सामान देते हैं, तो हम उसे दान कह देते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि अगर सामान सही तरीके और सम्मान के साथ नहीं दिया गया, तो वह दान नहीं बल्कि बोझ बन जाता है। गूंज ने इसी सोच को बदलने का प्रयास किया है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

गूंज का मकसद किसी को मदद के लिए मजबूर या कमजोर महसूस कराना नहीं है। यहां जरूरतमंदों को दया का पात्र नहीं, बल्कि सम्मान के साथ मदद दी जाती है। संस्था देशभर से हर तरह का उपयोगी सामान इकट्ठा करती है और फिर उनसे फैमिली किट तैयार करती है। ये किट हजारों गांवों तक भेजी जाती हैं, जहां लोग अपनी जरूरत के अनुसार उनका इस्तेमाल कर सकें।

सामाजिक नवाचार और बुनकरों का सशक्तिकरण

कार्यक्रम में ‘बुनकर स्टोरीज’ के चीफ मेंटर श्वेताभ रंजन ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने रेशम के धागे को लेकर एक अलग और नई सोच साझा की। श्वेताभ रंजन ने बताया कि उनका तरीका पूरी तरह अहिंसा पर आधारित है। आमतौर पर रेशम तैयार करने के लिए रेशम के कीड़ों को मार दिया जाता है, लेकिन उनके मॉडल में ऐसा नहीं किया जाता। उनका यह प्रयास भी सामाजिक उद्यमिता (Social Entrepreneurship) का एक बेहतरीन उदाहरण है, जो पर्यावरण और समाज दोनों के लिए लाभकारी है।

उन्होंने बताया कि उनके यहां रेशम का धागा इस तरह तैयार किया जाता है, जिसमें कीड़ों को नुकसान न पहुंचे। साथ ही उन्होंने यह भी समझाया कि कैसे इस तरीके से बुनकरों को आगे बढ़ने का मौका मिल रहा है। ‘बुनकर स्टोरीज’ का मकसद सिर्फ मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि बुनकरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। लेटेस्ट एजुकेशन और जॉब अपडेट्स के लिए यहां क्लिक करें।

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