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मार्च, 14, 2026
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पाकिस्तान में शुरू हुई Sanskrit Education: छात्रों को मिलेगा प्राचीन ज्ञान का अवसर

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Sanskrit Education: पाकिस्तान में पहली बार किसी विश्वविद्यालय में प्राचीन भाषा संस्कृत की पढ़ाई औपचारिक रूप से शुरू हुई है। लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज (LUMS) ने इस ऐतिहासिक पहल की है, जिससे शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में एक नया अध्याय खुला है।

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# पाकिस्तान में शुरू हुई Sanskrit Education: छात्रों को मिलेगा प्राचीन ज्ञान का अवसर

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पाकिस्तान में विभाजन के बाद पहली बार, लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज (LUMS) ने प्राचीन भाषा संस्कृत को अपने पाठ्यक्रम में शामिल करके एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। इस नए कार्यक्रम के तहत छात्रों को संस्कृत भाषा के साथ-साथ महाभारत और भगवद गीता जैसे गहन प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करने का भी अवसर मिलेगा। यह पहल क्षेत्रीय संस्कृति और ज्ञान को समझने की दिशा में एक बड़ा बदलाव है।

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इस पाठ्यक्रम की शुरुआत अचानक नहीं हुई, बल्कि तीन महीने तक चली एक सफल वीकेंड वर्कशॉप ने इसकी नींव रखी। इस वर्कशॉप में छात्रों, शोधकर्ताओं और भाषा के प्रति उत्साही व्यक्तियों ने सक्रिय रूप से भाग लिया। संस्कृत सीखने के प्रति दिखाई गई इस व्यापक रुचि और भागीदारी ने विश्वविद्यालय प्रशासन को प्रेरित किया कि वे इस विषय को एक नियमित और औपचारिक पाठ्यक्रम के रूप में स्थापित करें। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

## LUMS में Sanskrit Education की अहमियत

LUMS के गुरमानी केंद्र के निदेशक, डॉ. अली उस्मान कास्मी ने इस बात पर जोर दिया कि पाकिस्तान में संस्कृत से जुड़ी एक बहुत ही समृद्ध धरोहर मौजूद है, जिस पर लंबे समय से ध्यान नहीं दिया गया था। उन्होंने बताया कि पंजाब विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में संस्कृत की पांडुलिपियों का एक बड़ा और महत्वपूर्ण संग्रह सुरक्षित है, जो देश की सांस्कृतिक विरासत का एक अविभाज्य हिस्सा है। दुर्भाग्यवश, इस संग्रह को अक्सर अनदेखा किया गया है।

डॉ. कास्मी ने आगे बताया कि संस्कृत की कई ताड़ के पत्तों पर लिखी पांडुलिपियों को प्रसिद्ध विद्वान जे.सी.आर. वूलनर ने 1930 के दशक में सूचीबद्ध किया था। हालांकि, 1947 के बाद से पाकिस्तान के किसी भी स्थानीय विद्वान ने इन पांडुलिपियों पर गंभीरता से काम नहीं किया। अब तक इनका उपयोग अधिकतर विदेशी शोधकर्ता ही करते रहे हैं। ऐसे में, अब स्थानीय छात्रों और विद्वानों को संस्कृत में प्रशिक्षित करना इस स्थिति को बदलने और अपनी विरासत को पुनर्जीवित करने में मदद करेगा।

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इस पहल से जुड़े एसोसिएट प्रोफेसर शाहिद रशीद का कहना है कि जब उनसे पूछा जाता है कि वे संस्कृत क्यों सीख रहे हैं, तो उनका जवाब सीधा होता है: हमें इसे क्यों नहीं सीखना चाहिए? उनके अनुसार, संस्कृत पूरे इस क्षेत्र को जोड़ने वाली एक साझा भाषा रही है। यह भाषा सिर्फ किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे उपमहाद्वीप की सामूहिक सांस्कृतिक धरोहर है।

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## संस्कृत: एक साझा सांस्कृतिक विरासत

शाहिद रशीद ने इस बात पर प्रकाश डाला कि महान संस्कृत व्याकरणविद् पाणिनि का गांव भी इसी क्षेत्र में था। सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान यह क्षेत्र लेखन और ज्ञान का एक बड़ा केंद्र था। संस्कृत उस दौर की सोच, दर्शन और संस्कृति को समझने की कुंजी है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। उन्होंने संस्कृत की तुलना एक ऐसे पर्वत से की जो समय के साथ मजबूती से खड़ा रहा और आज भी हमारी सांस्कृतिक पहचान का एक सशक्त प्रतीक है।

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उनका मानना है कि संस्कृत को किसी एक धर्म से जोड़कर देखना अनुचित है। यह भाषा सभी की है और इसे अपनाने से इतिहास और संस्कृति को कहीं अधिक बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। इसी सोच के साथ LUMS में इस पाठ्यक्रम की शुरुआत की गई है, ताकि नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध और साझा विरासत से जोड़ा जा सके। लेटेस्ट एजुकेशन और जॉब अपडेट्स के लिए यहां क्लिक करें

## भविष्य की योजनाएं और सांस्कृतिक संवाद

विश्वविद्यालय आने वाले समय में इस ऐतिहासिक पहल को और आगे बढ़ाने की योजना बना रहा है। महाभारत और भगवद गीता पर आधारित अलग-अलग पाठ्यक्रम शुरू करने की तैयारी भी की जा रही है। डॉ. कास्मी का अनुमान है कि अगले 10 से 15 वर्षों में पाकिस्तान में ऐसे विद्वान देखने को मिल सकते हैं, जो इन प्राचीन ग्रंथों – गीता और महाभारत के विशेषज्ञ हों। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह न केवल शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा कदम होगा, बल्कि विभिन्न संस्कृतियों के बीच संवाद और समझ को भी बढ़ावा देगा।

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