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Daughter-in-law maintenance: इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, क्या बहू अब नहीं देगी सास-ससुर को गुजारा भत्ता?

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Daughter-in-law maintenance: रिश्तों की डोर अक्सर टूटकर भी बंधी रहती है, पर जब बात कानूनी पेचों की आती है, तो नैतिकता और बाध्यता के बीच का फर्क समझना ज़रूरी हो जाता है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में इसी पर रोशनी डाली है, जहाँ एक बहू को सास-ससुर को भरण-पोषण देने की कानूनी बाध्यता से मुक्त कर दिया गया। यह फैसला पारिवारिक संबंधों और कानूनी दायित्वों के बीच की बारीक रेखा को और स्पष्ट करता है।

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Daughter-in-law maintenance: इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, क्या बहू अब नहीं देगी सास-ससुर को गुजारा भत्ता?

Daughter-in-law maintenance पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का स्पष्टीकरण

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय न्याय सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 144 के तहत एक बहू अपने सास-ससुर को गुजारा भत्ता देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है। न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकल पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि गुजारा भत्ते के दावे का अधिकार एक सांविधिक अधिकार है, जो केवल इस धारा में विशेष रूप से उल्लिखित व्यक्तियों के वर्गों तक ही सीमित है। इस प्रावधान के दायरे में सास-ससुर शामिल नहीं होते।

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अदालत ने स्वीकार किया कि यह एक नैतिक दायित्व प्रतीत हो सकता है, लेकिन कानूनी अनिवार्यता के अभाव में इसे कानूनी दायित्व के तौर पर लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा, “विधायिका ने अपने विवेक से सास-ससुर को उक्त प्रावधान के दायरे में शामिल नहीं किया है।” यह बात अदालत ने चार फरवरी को दिए गए अपने निर्णय में कही, जब उसने एक बुजुर्ग दंपति राकेश कुमार और उनकी पत्नी द्वारा अपनी बहू के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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यह मामला तब सामने आया जब बुजुर्ग दंपत्ति ने आगरा की परिवार अदालत के प्रधान न्यायाधीश द्वारा अगस्त, 2023 में पारित आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। निचली अदालत ने भी उनके भरण-पोषण की मांग वाले आवेदन को पहले ही खारिज कर दिया था। दंपत्ति का तर्क था कि वे वृद्ध, अनपढ़ और अत्यंत गरीब हैं, और जीवन भर अपने दिवंगत बेटे पर पूरी तरह निर्भर थे।

उनकी बहू उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल के पद पर तैनात है और उसकी पर्याप्त आय है। इसके अलावा, उसे उनके मृतक बेटे के सेवानिवृत्ति लाभ भी प्राप्त हुए हैं। दंपत्ति ने दलील दी कि अपने बूढ़े सास-ससुर का भरण-पोषण करना उनकी बहू का नैतिक दायित्व है और इसे कानूनी दायित्व के तौर पर माना जाना चाहिए। हालांकि, अदालत ने इस दलील को इस आधार पर खारिज कर दिया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह संकेत मिले कि बहू की पुलिस में नौकरी अनुकंपा के आधार पर लगी है। यह भारतीय भरण-पोषण कानून की एक जटिल गुत्थी को उजागर करता है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: https://deshajtimes.com/news/national/

कानूनी और नैतिक दायित्व में अंतर

न्यायालय का यह फैसला कानूनी ढांचे और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है। जहाँ एक ओर नैतिक मूल्यों और परंपराओं के अनुसार बहू का कर्तव्य हो सकता है, वहीं कानून केवल उन दायित्वों को लागू करता है जिन्हें स्पष्ट रूप से विधायी प्रावधानों में परिभाषित किया गया है। यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि कानून को लागू करते समय भावनाओं से अधिक तथ्यों और स्थापित प्रावधानों को प्राथमिकता दी जाती है। इस प्रकार, इस मामले में, भले ही सास-ससुर की स्थिति दयनीय हो सकती है, लेकिन बहू पर कानूनी रूप से भरण-पोषण का बोझ नहीं डाला जा सकता है, क्योंकि वर्तमान कानून ऐसा करने की अनुमति नहीं देता। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह फैसला आने वाले समय में ऐसे अन्य मामलों के लिए एक नज़ीर बनेगा, जहाँ कानूनी प्रावधानों की स्पष्टता को महत्त्व दिया जाएगा।

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