



जब 11 साल की उम्र में गुरु की तलाश में घर से भागे, जानें भारत रत्न पंडित Bhimsen Joshi के अनसुने किस्से
Bhimsen Joshi: संगीत की दुनिया का वो सूरज, जिसकी एक तान से आज भी श्रोताओं के दिल में सुबह हो जाती है। कर्नाटक की धरती पर जन्मे इस सितारे ने अपनी आवाज़ से किराना घराने की विरासत को अमर कर दिया। उनका जन्म 4 फरवरी, 1922 को कर्नाटक के ‘गड़ग’ में हुआ था। उन्होंने 19 साल की उम्र से गायन शुरू किया और अगले सात दशकों तक अपनी कला से संगीत प्रेमियों को मंत्रमुग्ध करते रहे।
जब संगीत के लिए Bhimsen Joshi ने छोड़ दिया था घर
पंडित जी के पिता गुरुराज जोशी एक स्थानीय स्कूल में हेडमास्टर और कन्नड़, अंग्रेजी और संस्कृत के विद्वान थे, जबकि उनके दादा एक प्रसिद्ध कीर्तनकार थे। संगीत का माहौल उन्हें विरासत में मिला था। पाठशाला के रास्ते में एक ग्रामोफोन की दुकान पर अब्दुल करीम ख़ान की ठुमरी ‘पिया बिना नहि आवत चैन’ सुनकर बालक भीमसेन के मन में संगीत सीखने की ऐसी धुन सवार हुई कि मात्र 11 वर्ष की आयु में वे गुरु की तलाश में घर से निकल पड़े।
उनकी यह यात्रा किसी फ़िल्मी कहानी से कम नहीं थी। बिना टिकट ट्रेन में बैठकर वे बीजापुर पहुँचे। जब टिकट चेकर ने पकड़ा, तो उन्होंने अपनी सुरीली आवाज़ में राग भैरव छेड़ दिया, जिससे सभी यात्री और टीटी भी प्रभावित हो गए। कई शहरों में भटकने के बाद वे ग्वालियर के ‘माधव संगीत विद्यालय’ में पहुँचे, पर उन्हें कक्षा की नहीं, एक गुरु की तलाश थी। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। अंततः कई वर्षों बाद उनकी यह खोज सवाई गंधर्व पर जाकर समाप्त हुई, जिन्होंने उन्हें अपना शिष्य स्वीकार किया। गुरु ने भी शिष्य की कड़ी परीक्षा ली और डेढ़ साल तक गायन सिखाने के बजाय उनसे घर के काम करवाते रहे।
पुरस्कारों की झड़ी और ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ की अमर धुन
कठिन साधना के बाद, वर्ष 1941 में मात्र 19 साल की उम्र में उन्होंने मंच पर अपनी पहली प्रस्तुति दी। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने खयाल गायकी के साथ-साथ ठुमरी और भजन में भी महारत हासिल की। उनकी गायकी की विशेषता यह थी कि वे विभिन्न घरानों की खूबियों को मिलाकर एक अद्भुत शैली प्रस्तुत करते थे, जिसने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को एक नई ऊंचाई दी। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: https://deshajtimes.com/news/national/
पंडित जी को आज भी घर-घर में ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ गीत के लिए पहचाना जाता है, जिसमें उन्होंने लता मंगेशकर और बालमुरली कृष्णा के साथ जुगलबंदी की थी। यह गीत राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन गया। इसके अलावा उन्होंने ‘तानसेन’, ‘सुर संगम’ और ‘बसंत बहार’ जैसी कई फिल्मों के लिए भी अपनी आवाज दी। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। संगीत में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें देश-विदेश में अनगिनत सम्मान मिले।
- पद्म श्री (1972)
- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1976)
- पद्म भूषण (1985)
- पद्म विभूषण (1999)
- भारत रत्न (2008)
जब उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ मिलने की सूचना मिली, तो उनकी प्रतिक्रिया उनकी महानता को दर्शाती है। उन्होंने कहा, “मैं उन सभी हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायकों की तरफ से इस सम्मान को स्वीकार करता हूं जिन्होंने अपनी ज़िंदगी संगीत को समर्पित कर दी।” संगीत के इस साधक का 24 जनवरी, 2011 को पुणे में निधन हो गया, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी अमर है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

