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Bhojpur Koilwar Bridge News: 164 साल पुराना कोईलवर का अब्दुल बारी पुल हो रहा अपग्रेड! जानिए क्यों है खास

भोजपुर जिले के कोईलवर में स्थित 164 साल पुराना अब्दुल बारी पुल अब आधुनिकता की नई पहचान पाएगा। बिहार को राजधानी से जोड़ने वाले इस ऐतिहासिक रेल-सह-सड़क पुल का जीर्णोद्धार उसकी संरचनात्मक मजबूती को बढ़ाएगा, जिससे यह महत्वपूर्ण धरोहर भविष्य के लिए सुरक्षित हो सकेगी।

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Bhojpur Koilwar Bridge News: बिहार के भोजपुर क्षेत्र को राजधानी पटना से जोड़ने वाला ऐतिहासिक कोईलवर रेल-सह-सड़क पुल, जिसे अब्दुल बारी पुल के नाम से भी जाना जाता है, अब अपग्रेड किया जा रहा है। यह पुल दानापुर रेल मंडल के हावड़ा-दिल्ली मुख्य रेल मार्ग पर स्थित है और अपनी अद्वितीय संरचना के लिए जाना जाता है। इसका जीर्णोद्धार कार्य इसे और अधिक मजबूत तथा सुरक्षित बनाएगा।

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लगभग 1.44 किलोमीटर लंबा यह पुल डबल डेकर डिजाइन पर आधारित है। इसके ऊपरी हिस्से से रेलगाड़ियों का आवागमन होता है, जबकि निचले हिस्से से सड़क यातायात सुगमतापूर्वक संचालित होता है। इसके निर्माण में उच्च गुणवत्ता वाले रॉट आयरन का इस्तेमाल किया गया था, जिसकी वजह से इसके पिलर आज भी अपनी मजबूती के लिए मशहूर हैं।

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रेलवे अधिकारी इस पुल की सुरक्षा को लेकर हमेशा सतर्क रहते हैं। इसकी संरचनात्मक मजबूती सुनिश्चित करने के लिए चौबीसों घंटे पेट्रोलिंग की जाती है। इसके अतिरिक्त, प्रतिदिन की-मैन द्वारा पुल की फिटिंग्स और अन्य सभी तकनीकी पहलुओं की गहन जांच की जाती है।

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कोईलवर पुल का गौरवशाली इतिहास और इंजीनियरिंग का कमाल

इस पुल का निर्माण कार्य वर्ष 1856 में शुरू किया गया था, लेकिन 1857 के सिपाही विद्रोह के कारण इसके काम में कुछ विलंब हुआ। बाद में, भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड एल्गिन ने वर्ष 1862 में इस महत्वपूर्ण पुल का विधिवत उद्घाटन किया। यह पुल अपने समय की एक बड़ी उपलब्धि माना गया।

जेम्स मीडोज रेंडेल और सर मैथ्यू डिग्बी वायट जैसे प्रतिष्ठित इंजीनियरों द्वारा डिजाइन किया गया यह पुल उस दौर में पूरे एशिया का सबसे लंबा पुल माना जाता था। यह भारत का सबसे पुराना चालू रेल-सह-सड़क पुल भी है, जिसने कई दशकों तक लाखों लोगों की यात्रा को सुगम बनाया है। ऑस्कर पुरस्कार विजेता फिल्म ‘गांधी’ (1982) में भी इस पुल को प्रमुखता से दिखाया गया था, जो इसकी ऐतिहासिक महत्ता को दर्शाता है।

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सुरक्षा और आधुनिकीकरण के विशेष उपाय

वर्तमान में रेलवे द्वारा इस पुल पर कई महत्वपूर्ण उन्नयन कार्य किए जा रहे हैं। इनमें नए डिजाइन के एच-बीम स्लीपर लगाना, पुराने चेकर प्लेट्स को बदलना और गर्डरों को फिर से पेंट करना शामिल है। इन कार्यों का मुख्य उद्देश्य पुल की उम्र को बढ़ाना और उसे भविष्य के लिए तैयार करना है।

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अधिकारियों का दावा है कि ये उन्नयन कार्य पूरा होने के बाद, यह ऐतिहासिक पुल आने वाले कई दशकों तक सुरक्षित और सुचारु रूप से उपयोग में बना रहेगा। यह महत्वपूर्ण देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें Bihar Railway Bridge News सिर्फ परिवहन का माध्यम ही नहीं, बल्कि बिहार की समृद्ध ऐतिहासिक और इंजीनियरिंग विरासत का भी एक मजबूत प्रतीक है। सोन नदी के दोनों किनारों को जोड़ने वाला यह पुल आज भी अपना महत्व बरकरार रखे हुए है।

नया सेतु, नई राहत और भविष्य की तैयारी

ऐतिहासिक अब्दुल बारी पुल के समानांतर सोन नदी पर अब एक नया फोरलेन सड़क पुल भी बनकर तैयार हो गया है, जिसे वशिष्ठ नारायण सिंह सेतु नाम दिया गया है। इस नए सेतु के चालू होने से अब इस मार्ग पर सड़क और रेल यातायात पूरी तरह से अलग-अलग हो गए हैं। यह कदम एक बड़ी राहत लेकर आया है।

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वशिष्ठ नारायण सिंह सेतु के शुरू होने से पटना से भोजपुर, बक्सर और उत्तर प्रदेश आने-जाने वाले वाहनों को पुराने पुल पर लगने वाले भीषण जाम से हमेशा के लिए मुक्ति मिल गई है। इससे पूरे क्षेत्र का आवागमन काफी सुगम हो गया है और यात्रा का समय भी कम हुआ है।

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इस प्रकार, कोईलवर का अब्दुल बारी पुल अपने ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ आधुनिकता की दौड़ में भी आगे बढ़ रहा है। इसका जीर्णोद्धार न केवल इसकी संरचनात्मक अखंडता को बनाए रखेगा, बल्कि बिहार की प्रगति और विरासत का भी एक उज्ज्वल उदाहरण प्रस्तुत करेगा। यह इंजीनियरिंग का एक जीवित स्मारक है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों को जोड़ता रहेगा।

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