
बिहार ड्रग मेनेस: फारबिसगंज में जो हुआ, वो सिर्फ एक खौफनाक अपराध नहीं था, बल्कि समाज के गहरे जख्मों को कुरेदने वाली एक घटना थी। मो. नवी हसन की मौत और फिर आरोपी रवि चौहान के साथ हुई कथित लिंचिंग, यह सवाल उठाती है कि आखिर न्याय की परिभाषा क्या है? क्या भीड़ का गुस्सा ही असली न्याय है, या इसके पीछे कुछ और गहरी साजिश है?
अररिया के फारबिसगंज में मो. नवी हसन के साथ हुई अमानवीय घटना ने पूरे बिहार को झकझोर कर रख दिया है। यह सिर्फ एक व्यक्ति पर हुआ अत्याचार नहीं, बल्कि एक ऐसे ‘पैटर्न’ का हिस्सा है जो समाज के ताने-बाने को लगातार कमजोर कर रहा है। घटना के तुरंत बाद पुलिस प्रशासन ने जिस तरह की ‘तेज’ प्रतिक्रिया दी, वह इस ओर इशारा करती है कि उन्हें स्थिति के सांप्रदायिक रूप लेने का अंदेशा था। आरोपी रवि चौहान को भीड़ के बीच कथित रूप से ‘छोड़ा’ जाना और उसके बाद जो हुआ, वह एक बड़े सांप्रदायिक तनाव को टालने की ‘शातिराना’ कोशिश लग सकती है। शहर बेशक एक बड़े फसाद से बच गया हो, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह न्याय का सही तरीका है? या फिर यह प्रशासन की अपनी नाकामी को ढंकने की एक कोशिश मात्र थी? आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1।
बिहार ड्रग मेनेस: नशे का जाल, अपराध की जड़
आज समाज के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि ऐसी दरिंदगी की हिम्मत इन अपराधियों में आती कहां से है? इसका सीधा और कड़वा जवाब है – नशा, स्मैक, नशे की गोलियां, जहरीली शराब और ‘संफेक्स’ जैसे मादक पदार्थों ने हमारे युवाओं को अंदर से खोखला कर दिया है। सरकार कागजों पर भले ही शराबबंदी के लाख दावे कर ले, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही चीख रही है। क्या यह सच नहीं कि आज हर गली-नुक्कड़ पर नशा खुलेआम बिक रहा है? क्या यह सच नहीं कि शराबबंदी के बावजूद ‘होम डिलीवरी’ का खेल धड़ल्ले से जारी है? नशे की यह भयावह हकीकत दिखाती है कि नशे का कारोबार कितनी तेजी से युवाओं को अपनी गिरफ्त में ले रहा है।
नेताओं की स्वीकारोक्ति: नशे पर सिर्फ कागजी कार्रवाई?
फारबिसगंज के विधायक मनोज विश्वास ने खुद एक चैनल पर इस कड़वे सच से पर्दा उठाया कि नशा खुलेआम मिल रहा है। जब जनप्रतिनिधि स्वयं इस बात को स्वीकार कर रहे हैं, तो फिर प्रशासन की मुस्तैदी और उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठना लाजिमी है। ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर ऐसी भयावह स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है? आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1। न्याय सिर्फ एक अपराधी के मारे जाने से नहीं होता; असली न्याय तब होगा जब इस नशे का कारोबार की पूरी सप्लाई चेन को तोड़ा जाएगा, जो युवाओं के हाथ में नशा और दिमाग में हिंसा भर रही है।
अगर समय रहते नशे के इस भयावह चक्र पर लगाम नहीं कसी गई, तो कल कोई और नवी हसन इसका शिकार होगा और कोई और रवि चौहान पैदा होगा। हमें सिर्फ चुप नहीं रहना है, हमें सवाल पूछना होगा – आखिर कब तक हमारे शहर नशे और नफरत की भेंट चढ़ते रहेंगे? इस बिहार ड्रग मेनेस को जड़ से खत्म करने के लिए सामूहिक प्रयास और कड़ी कार्रवाई की नितांत आवश्यकता है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें







