



अभिनेता धर्मेन्द्र को अगर काल ने 24 नवम्बर 2025 को हमसे न छीना होता, वे आज 8 दिसम्बर को अपने परिवार के साथ अपना 90वाँ जन्मदिन मनाते और अपने अंदाज में ठुमकते हुए गाते, मैं जट यमला पगला दीवाना…। लेकिन अब यह नामुमकिन है और यही सच है कि हमारे दुलारे अभिनेता धर्मेन्द्र हमारे बीच आज नहीं हैं।
धर्मेंद्र का जन्म 8 दिसंबर 1935 को ब्रिटिश भारत के पंजाब के लुधियाना जिले के गांव नसराली में धरम सिंह देओल के रूप में हुआ था। वे केवल कृष्ण और सतवंत कौर पंजाबी जाट परिवार की संतान थे, लेकिन उनका पैतृक गांव लुधियाना के पखोवाल तहसील रायकोट के पास डांगों है। उन्होंने अपना प्रारंभिक जीवन साहनेवाल गांव में बिताया और लुधियाना के ललतोंकलां में सरकारी माध्यमिक विद्यालय में पढ़ाई की, जहाँ उनके पिता प्रधानाध्यापक थे।
फिल्मों को लेकर धर्मेन्द्र अलग सोच रखते थे। एक्टर बनने का ख्वाब उन्हें दिलीप कुमार और कामिनी कौशल अभिनीत फिल्म शहीद (1948) देखने के बाद आया था। यह फिल्म धर्मेन्द्र ने लुधियाना के मिनर्वा सिनेमा घर में देखी थी। वह उस समय आठवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। वह दिलीप कुमार से बेहद प्रभावित थे। फ्रंटियर मेल को वह रोज देखते थे, जो तब बम्बई (अब मुम्बई) जाने वाली एकमात्र ट्रेन थी।
पिता के डर ने उन्हें पढ़ने को मजबूर किया। किसी तरह उन्होंने 1952 में फगवाड़ा से मैट्रिक किया। उसके बाद नौकरी करने लगे। साइकिल से ड्यूटी जाते समय रास्ते में फिल्मी पोस्टर देखते और ख्यालों में खो जाते। देर शाम घर आकर आइने में खुद को देखकर पूछते, क्या मैं हीरो बन सकता हूं? पिता से तो नहीं, लेकिन मां से इस बारे में बात करते थे। एक बार वे बम्बई (अब मुम्बई) गए भी, लेकिन बात नहीं बनी। जब घर आए, तब पिता ने उनकी शादी कर दी। धर्मेंद्र की पहली शादी फिल्म उद्योग में प्रवेश करने से पहले 1954 में 19 साल की उम्र में प्रकाश कौर से हो गई थी। इस शादी से उनके दो बच्चे बेटे अजय देओल यानी सनी देओल और बेटी विजेता हुईं। विजय देओल यानी बॉबी देओल और बेटी अजेता का जन्म बाद में मुम्बई में हुआ।
एक दिन धर्मेन्द्र के हाथ लगी फ़िल्मफ़ेयर मैग्जीन। उसमें हीरो बनने के लिए कॉन्टेस्ट का विज्ञापन छपा था। पन्ना फाड़ा और फोटो वाली जगह पर जान मोहम्मद द्वारा खींची गई तस्वीर को चिपका कर 1958 के मध्य में फ़िल्मफ़ेयर पत्रिका को साहनेवाल, लुधियाना, पंजाब से डाक द्वारा भेज दिया। उस कॉन्टेस्ट के जूरी मेंबर थे विमल राय, गुरुदत्त आदि। उनका चयन हो गया। वक्त के साथ उनके ख्वाब पूरे हुए। कुछ समय बाद पहली फिल्म दिल भी तेरा हम भी तेरे (1960) के लिए बतौर मेहनताना उन्हें 51 रुपए मिले। फिल्म की हीरोइन थीं कुमकुम। यह लोगों को पसंद नहीं आई, लेकिन बुरे वक्त को भी धर्मेन्द्र ने धैर्य के साथ जीया। मुट्ठी भर चने खाकर भी दिन गुजारे। किसी से सोने को जगह मिली, किसी ने नाश्ते का प्रबंध किया। फिल्मों में खुद को जमाने के लिए धर्मेन्द्र ने कड़ी मेहनत की। अपनी उम्मीद को उन्होंने कभी मरने नहीं दिया।
धर्मेंद्र ने 1960 के दशक के मध्य में आई मिलन की बेला, फूल और पत्थर और आए दिन बहार के जैसी फिल्मों के जरिए लोकप्रियता हासिल की और बाद के वर्षों में अधिक स्टारडम हासिल किया। हिंदी फिल्मों में उनकी कई ऑन-स्क्रीन भूमिकाओं के लिए उन्हें भारत का ही-मैन करार दिया गया। उन्होंने 1960 के दशक से लेकर 1980 के दशक तक लगातार कई सफल हिंदी फिल्मों में अभिनय किया, जैसे आंखें, शिकार, आया सावन झूम के, जीवन मृत्यु , मेरा गांव मेरा देश, सीता और गीता, राजा जानी, जुगनू , यादों की बारात, दोस्त , शोले , प्रतिज्ञा , चरस , धरम वीर , चाचा भतीजा , गुलामी , हुकूमत , दिल्लगी, द बर्निंग ट्रेन, नया जमाना, समाधि, रेशम की डोरी, ग़ज़ब, कातिलों के कातिल, आग ही आग, एलान-ए-जंग और तहलका आदि के साथ ही उनके कुछ प्रशंसित फिल्मों में अनपढ़, बंदिनी, हकीकत, पूर्णिमा, अनुपमा, ममता, मंझली दीदी, सत्यकाम, काजल, चुपके चुपके वगैरह शामिल हैं।
फिल्मों में खूब शोहरत पाने के बाद धर्मेंद्र ने हेमा मालिनी से भी शादी की, जो उस समय विवाद का कारण बनी, क्योंकि वह पहले से ही शादीशुदा थे। उन्होंने और हेमा मालिनी ने 1970 के दशक में कई फिल्मों में साथ काम किया। इनकी जोड़ी खूब सफल हुई। इस जोड़ी की दो बेटियां हैं, ईशा देओल और अहाना देओल।
300 सौ से अधिक फिल्मों में काम करने वाले धर्मेंद्र एक भारतीय अभिनेता के साथ ही निर्माता और राजनीतिज्ञ भी थे। वो लोकसभा क्षेत्र बीकानेर के भाजपा सासंद भी रहे। हिंदी फिल्मों में ही-मैन के रूप में प्रसिद्ध धर्मेंद्र ने लगभग पांच दशक तक सक्रिय रूप से अभिनय किया। सन 1997 में उन्हें हिंदी सिनेमा में उनके योगदान के लिए फिल्मफेयर का लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला और सन 2012 में उन्हें भारत सरकार द्वारा भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
पंजाब के एक गांव से मुंबई में मेहनत और धैर्य की वजह से फिल्मी दुनिया में खास जगह बनाने वाले धर्मेन्द्र ने बहुत से नए पुराने कलाकारों को हौसला दिया। उन्होंने खुद को कभी बड़ा और समर्थ कलाकार नहीं माना। वे हमेशा एक आम इंसान की तरह लोगों के साथ पेश आए और जरूरतमंद लोगों की यथासंभव मदद की। उनकी सादगी और बोलने के अंदाज लोगों को अपनापन देते थे। बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान को भी तब उन्होंने कहा था, कोई परेशान करे तो बताना, मैं हूं।
1990 के दशक के अंत में धर्मेन्द्र कई सफल और प्रशंसित फिल्मों में चरित्र भूमिकाओं में दिखाई दिए, जैसे प्यार किया तो डरना क्या, लाइफ इन ए… मेट्रो, अपने, जॉनी गद्दार, यमला पगला दीवाना, तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया और रॉकी और रानी की प्रेम कहानी आदि। उनकी एक फिल्म जल्द आने वाली है इक्कीस। यह फिल्म सन 1971 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए परमवीर चक्र विजेता सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की सच्ची कहानी पर आधारित है। इसमें धर्मेंद्र ने अरुण के पिता, ब्रिगेडियर एम. एल. खेत्रपाल की भूमिका निभाई है। इसमें अरुण की भूमिका में अमिताभ बच्चन के नाती अगस्त्य नंदा दिखेंगे। अगस्त्य के अपोजिट इसमें अक्षय कुमार की भांजी सिमर भाटिया हैं। फिल्म का ट्रेलर इन दिनों दिख रहा है। यह 25 दिसम्बर को रिलीज होगी।
इसमें कोई दो राय नहीं कि फिल्म इक्कीस में भी उन्होंने अपनी भूमिका को नेकी के साथ जीया होगा। धर्मेन्द्र अपने मिलने वाले से अक्सर कहते थे, नेकी से बड़ा कोई ग्रंथ नहीं। सच में, धर्मेन्द्र के साथ मुकद्दर थी और जीवन में मेहनत को उन्होंने हमसफर बनाया था, इसीलिए आज उन्हें हम सब याद कर रहे हैं…।





