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CAPF Bill: केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल विधेयक… सुरक्षा बलों के लिए आएगा नया कानून, एकरूपता और दक्षता होगी सुनिश्चित

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CAPF Bill: एक बड़ा बदलाव दस्तक दे रहा है, जहां देश की आंतरिक और सीमा सुरक्षा की रीढ़ केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों का प्रबंधन अब एक नई व्यवस्था में ढलने जा रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सोमवार को राज्यसभा में ‘केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026’ पेश करेंगे, जिसका उद्देश्य इन महत्वपूर्ण बलों में भर्ती, प्रतिनियुक्ति और पदोन्नति की प्रक्रिया को एक एकीकृत नियामक ढांचे में लाना है।

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वर्तमान में, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ), सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ), भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) और सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) जैसे सभी केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) अपने-अपने विशिष्ट अधिनियमों द्वारा शासित होते हैं। इन अधिनियमों के तहत निर्मित नियम सीएपीएफ में समूह ‘ए’ सामान्य ड्यूटी अधिकारियों के साथ-साथ अन्य अधिकारियों और कर्मियों की भर्ती एवं सेवा शर्तों को नियंत्रित करते हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह नया विधेयक एकरूपता लाकर इन नियमों को सुव्यवस्थित करेगा।

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केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल विधेयक: क्यों पड़ी इसकी आवश्यकता?

विशेषज्ञों और सरकारी सूत्रों के अनुसार, वर्तमान में बलों के बिखरे हुए नियामक ढांचे के कारण कई चुनौतियाँ सामने आ रही थीं, जिसने प्रभावी पुलिस सुधारों को बाधित किया है।

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  • परिचालन संबंधी भिन्नता: प्रत्येक बल की अपनी विशिष्ट संगठनात्मक संरचना और कार्यात्मक आवश्यकताएं हैं, जिन्हें अलग-अलग नियमों के कारण प्रबंधित करना कठिन हो रहा था।
  • मुकदमेबाजी का बढ़ता बोझ: एक साझा कानून के अभाव में सेवा संबंधी मामलों और पदोन्नति को लेकर अक्सर अदालती विवाद (मुकदमेबाजी) जन्म लेते रहे हैं, जिससे न्यायिक प्रक्रिया पर अनावश्यक दबाव पड़ता है।
  • प्रशासनिक पेचीदगियां: नियमों की भिन्नता बलों के बीच समन्वय और समग्र प्रशासनिक दक्षता में बाधा डालती है, जिससे आंतरिक सुरक्षा प्रबंधन प्रभावित होता है।
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अधिकारियों ने बताया कि सीएपीएफ को नियंत्रित करने के लिए कोई एक केंद्रीय कानून न होने के कारण नियामक ढांचा टुकड़ों में विकसित हुआ। इसी बिखराव के चलते सेवा संबंधी मामलों में मुकदमेबाजी और कई कार्यात्मक तथा प्रशासनिक कठिनाइयां उत्पन्न होती हैं। इस विधेयक का लक्ष्य केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में समूह ‘ए’ सामान्य ड्यूटी अधिकारियों तथा अन्य अधिकारियों की भर्ती एवं सेवा शर्तों को नियंत्रित करने वाले सामान्य नियमों को स्थापित करना है, ताकि उनसे जुड़े सभी मामलों को विनियमित किया जा सके।

सूत्रों के हवाले से खबर है कि प्रस्तावित कानून इन केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में नियुक्त समूह ‘ए’ सामान्य ड्यूटी अधिकारियों और अन्य अधिकारियों की सेवा शर्तों को विनियमित करेगा। विधेयक में यह भी सुझाव दिया गया है कि महानिरीक्षक (आईजी) और उससे ऊपर के पदों पर भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारियों की नियुक्ति के लिए एक निश्चित अनुपात तय किया जाए। इसके तहत, महानिरीक्षक रैंक में 50 प्रतिशत पद प्रतिनियुक्ति से भरे जाएंगे, जबकि अतिरिक्त महानिदेशक (एडीजी) रैंक के कम से कम 67 प्रतिशत पद प्रतिनियुक्ति से भरे जाने का प्रस्ताव है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

विधेयक के अनुसार, विशेष महानिदेशक (एसडीजी) और महानिदेशक (डीजी) के पद केवल प्रतिनियुक्ति से ही भरे जाएंगे। यह प्रस्तावित कानून ऐसे समय में आया है, जब उच्चतम न्यायालय ने पिछले वर्ष अक्टूबर में केंद्र सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें उसने 2025 के एक फैसले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया था। उस फैसले में भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों की केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में प्रतिनियुक्ति कम करने और छह महीने में कैडर समीक्षा करने का निर्देश दिया गया था। यह कदम देश की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने और पुलिस सुधारों को गति देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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आईपीएस अधिकारियों की भूमिका और समन्वय

प्रस्तावित कानून का एक अहम उद्देश्य केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों की मौजूदा प्रतिनियुक्ति व्यवस्था को बनाए रखना है। यह सुनिश्चित करेगा कि जमीनी स्तर पर और शीर्ष प्रबंधन में अनुभवी नेतृत्व मिलता रहे, जिससे सुरक्षा बलों की कार्यप्रणाली में निरंतरता और दक्षता बनी रहे। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह विधेयक केंद्रीय बलों के आधुनिकीकरण और उनकी प्रशासनिक जटिलताओं को कम करने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।

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