Indian Railway IRCTC: धुंध की चादर जब घना रूप लेती है, तो पटरियों पर ट्रेन की रफ्तार भी हांफने लगती है। करोड़ों खर्च के बाद भी जब हालात न सुधरें, तो सवाल उठना लाजिमी है। देश की जीवनरेखा भारतीय रेल, जो हर दिन लाखों यात्रियों को उनकी मंजिल तक पहुंचाती है, वह सर्दियों में कोहरे के आगे बेबस दिख रही है।
Indian Railway IRCTC: 5 करोड़ खर्च, फिर भी 90% ट्रेनें लेट – एंटी-फॉग डिवाइस की हकीकत!
Indian Railway IRCTC: एंटी-फॉग डिवाइस की सीमित क्षमता का सच
सर्दी के मौसम में घना कोहरा ट्रेनों के परिचालन में सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरता है। इस चुनौती से निपटने के लिए भारतीय रेलवे ने एंटी-फॉग डिवाइस पर करीब पांच करोड़ रुपये खर्च किए हैं। लेकिन, जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ये तथाकथित आधुनिक डिवाइस लोको-पायलट को केवल दो सिग्नलों के बीच 500 मीटर पहले ही यह बता पाती हैं कि सिग्नल लाल है या हरा। इसके बाद के क्षेत्र में या उससे पहले के बड़े हिस्से में लोको-पायलट के लिए ये डिवाइस बिल्कुल भी उपयोगी साबित नहीं होती हैं। इसका सीधा असर ट्रेनों की रफ्तार और समयबद्धता पर पड़ रहा है।
कोहरे में रेल संचालन एक जटिल कार्य बन जाता है, जहां हर मिनट की देरी यात्रियों के लिए परेशानी का सबब बनती है। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब सुरक्षा उपायों पर भारी-भरकम खर्च के बावजूद वांछित परिणाम नहीं मिलते। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। स्थिति यह है कि पांच करोड़ रुपये के खर्च के बाद भी, कोहरे के कारण 90 प्रतिशत से अधिक ट्रेनें अपने निर्धारित समय से देरी से चल रही हैं। यह न केवल यात्रियों के लिए असुविधाजनक है, बल्कि रेलवे की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
लोको-पायलटों को आज भी विजिबिलिटी कम होने पर मैन्युअल रूप से गति कम करने और अत्यधिक सावधानी बरतने पर निर्भर रहना पड़ता है। यह दर्शाता है कि तकनीक को पूरी तरह से लागू करने और उसकी प्रभावशीलता सुनिश्चित करने में कहीं न कहीं कमी रह गई है।
ट्रेन यात्रियों की बढ़ी मुश्किलें और रेलवे की चुनौती
घने कोहरे के कारण ट्रेनों की देरी का सीधा खामियाजा आम यात्रियों को भुगतना पड़ता है। प्लेटफॉर्म पर घंटों इंतजार, यात्रा के समय में अप्रत्याशित वृद्धि और कनेक्टिंग ट्रेनों का छूटना जैसी समस्याएं आम हो गई हैं। रेलवे प्रशासन के सामने अब यह चुनौती है कि वह इन महंगी डिवाइसों की उपयोगिता पर गंभीरता से विचार करे और कोहरे के दौरान रेल संचालन को सुचारू बनाने के लिए अन्य प्रभावी उपायों पर गौर करे। क्या इन डिवाइसों को उन्नत करने की आवश्यकता है, या फिर कोई वैकल्पिक और अधिक कारगर समाधान खोजना होगा? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब रेलवे को जल्द ही ढूंढना होगा ताकि यात्रियों को सुरक्षित और समय पर यात्रा का अनुभव मिल सके। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। रेलवे को अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लानी होगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि जनता के पैसे का सही इस्तेमाल हो।




