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फ़रवरी, 11, 2026
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ग़ज़ब ये है के गुनाहों को अंधेरा जांच रहा है, पढ़िए, जटिल दर्शन जांच का…!

Praveen Kumar Jha (लेखक: शिक्षाविद् समालोचक, पत्रकार हैं। संप्रति: CM Science College में आइक्यूएसी सहायक के पद पर कार्यरत हैं) कहते हैं, उजालों ने शिकायत की है रात के क़ुसूर की, ग़ज़ब ये है के गुनाहों को अंधेरा जांच रहा है, पढ़िए, जटिल दर्शन जांच का...!

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न दिनों देश में जांच का मौसम चल रहा है। बहुत-सी जांचें चल रही हैं। जांच करने वाले दिन-रात जांच करने में लगे हैं। नाना प्रकार के घोटाले हैं, भ्रष्टाचार के मामले हैं ।

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जांच की नजर सभी पर समान रूप से पड़ रही हैं। जांच से कोई नहीं बच पा रहा है। सभी की जांच जारी है। यहां तक की जांच करने वालों की भी जांच हो रही है। और, जो जांच करने वालों की जांच करेंगे, उनकी भी जांच होगी।

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जांच अद्भुत चीज है। यह ना प्रकट है न अप्रकट। न वायु है, न जल। न व्याख्येय है और न ही अव्याख्येय। भारतीय संदर्भ में जांच शाश्वत है, अजर-अमर है, स्थाई है। लोग आते-जाते हैं, पर जांच हमेशा चलती रहती है।

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जांच चूंकि जांच है, तो चलना उसका परम धर्म है। जिस कार्य पर उसे लगाया गया है, वह करना उसका कर्म है। जांच पीछे नहीं हटती, आगे नहीं बढ़ती। बहुत उत्साह से काम करती है, बहुत हताशा में जाकर खत्म होती है।

जांच करने वाले कभी इधर छापा मारते हैं, कभी उधर तलाशी लेते हैं। शुरू-शुरू में ऐसा ही होता है। वह क्रीज पर आए नए बल्लेबाज की तरह स्फूर्तिवान होती है। बहुत ही तेज गति से चलती है। बहुत ही ज्यादा पूछताछ करती है। जल्दी-जल्दी पूछताछ करती है। नए-नए तथ्य लाकर लोगों को चौंका देती है।

जनता प्रसन्न हो जाती है। उसे लगता है बस सब कुछ, कुछ ही दिनों में सामने आ जाएगा। पर जांच की इतनी अच्छी किस्मत कहां, अचानक कोई दूसरा मामला उछलता है। सरकार अपने झोले से एक जांच और उछाल देती है। अब जनता इस जांच को निहारने लगती है। उस जांच को भूल जाती है।

अब कोई क्या करे? जांच की तकदीर ही खराब होती है। जैसे-जैसे जांच पुरानी पड़ती है, उसकी गति धीमी पड़ती जाती है। ध्यान न देने के कारण वह थकने-हांपने लग जाती है। कोई उसे देख नहीं रहा, इस अफसोस में डूब जाती है। उसकी फाइलें धूल-धूसरित होने लगती है। तारीखें आगे बढ़ने लगती हैं।

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पुरानी जांच सरकार से प्रार्थना करती है, पर सरकार को फूर्सत कहां ! न जाने कितनी नई जांचें तब तक चल चुकी होती हैं, सरकार भी कहां-कहां ध्यान दे? नई जांच करवाए या पुरानी पर ध्यान दे? कितने घोटाले, कितने भ्रष्टाचार हैं! अब कोई पहले का जमाना तो रहा नहीं कि एक घोटाला घट गया और देश उससे ही चिपक कर रह जाए, उसी का होकर रह जाए।

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पहले जहां महीनों-सालों में एक-आध घोटाला होता था, अब यहां प्रतिदिन एक की दर से दस घोटाले हो रहे हैं, बल्कि कई बार तो दिन में सौ घोटाले हो जाते हैं। अब बेचारी सरकार भी कहां तक ध्यान दे! कभी-कभी उसका स्टॉक भी खत्म हो जाता है।

नया स्टॉक आए तो नई जांच शुरू हो। जनता कभी-कभी परेशान हो जाती है। जल्दी कराने की मांग कर बैठती है। पर सरकार सचमुच क्या करे। भई, सब कुछ यहां नियम से ही चलेगा। जांचों की भी सीनियरिटी होती है, जब इतनी पुरानी जांचें पेंडिंग पड़ी हैं तो नई का नंबर भला कैसे आएगा?

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फिर मुसीबत यह है कि केवल एक जांच पूरी हो जाने से ही तो यह खत्म नहीं हो जाती। अब किसी को दोषी ठहरा दो तो वह भला कहां अपने को दोषी मानने वाला! वह जांच की जांच करने की मांग कर बैठता है। तो फिर एक नई जांच शुरू हो जाती है।

बहरहाल, जांच का दर्शन जटिल है। जितना आगे बढ़ो उतना ही उलझता जाता है। जांच कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया है। व्यक्ति चला जाता है पर जांच चलती रहती है। आरोपी नश्वर है, पर जांच शाश्वत। वह चलती आई है और चलती ही रहेगी। उसे कोई नहीं रोक सकता। हम जनता हैं, हमारे हिस्से में इसका साक्षी होना भर है। सो देख रहे हैं और कर भी क्या सकते हैं!

प्रवीण कुमार झा
(लेखक: शिक्षाविद् समालोचक, पत्रकार हैं। संप्रति: सीएम साइंस कॉलेज में आइक्यूएसी सहायक के पद पर कार्यरत हैं)

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