



Maneka Gandhi Supreme Court: न्यायपालिका की गरिमा पर सवाल उठाना महंगा पड़ सकता है, लेकिन कभी-कभी अदालत भी नरमी दिखाती है। कुछ ऐसा ही हुआ पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के मामले में। सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू करने से परहेज किया है। उन्होंने आवारा कुत्तों के प्रबंधन से संबंधित शीर्ष अदालत के आदेशों की आलोचना की थी, जिसके बाद यह मामला सामने आया था।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजारी की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। पीठ ने टिप्पणी की कि पूर्व मंत्री ने हर तरह की टिप्पणियां की हैं और प्रथम दृष्टया यह अदालत की अवमानना के दायरे में आता है। हालांकि, उदारता दिखाते हुए बेंच ने अवमानना की कार्यवाही शुरू न करने का फैसला किया। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह घटनाक्रम सार्वजनिक हस्तियों द्वारा न्यायिक फैसलों पर टिप्पणी करते समय संयम बरतने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
मेनका गांधी सुप्रीम कोर्ट: टिप्पणियों पर पीठ ने जताई नाराजगी
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति मेहता ने मेनका गांधी के वकील से तीखा सवाल किया। उन्होंने पूछा कि एक पूर्व केंद्रीय मंत्री के रूप में, उन्होंने आवारा कुत्तों की समस्या को खत्म करने के लिए बजट में कितना आवंटन कराने में मदद की थी? इस सवाल का मेनका गांधी की ओर से कोई सीधा जवाब नहीं आया। पीठ ने विशेष रूप से उनकी उस टिप्पणी को गंभीरता से लिया, जिसमें उन्होंने कुत्तों को खाना खिलाने वालों को जवाबदेह ठहराने की बात कही थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह टिप्पणी व्यंग्यपूर्ण नहीं बल्कि गंभीर प्रकृति की थी।
गौरतलब है कि 13 जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा था कि वह राज्यों को कुत्ते के काटने की घटनाओं के लिए “भारी मुआवजा” देने का आदेश देगा और ऐसे मामलों में कुत्तों को खाना खिलाने वालों को जवाबदेह ठहराएगा। इस पृष्ठभूमि में, मेनका गांधी की टिप्पणियां अदालत के लिए चिंता का विषय बनीं। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
गांधी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन से पूछताछ करते हुए पीठ ने कठोर लहजे में कहा, “आपने कहा कि अदालत को टिप्पणी करते समय सावधानी बरतनी चाहिए; लेकिन क्या आपने अपनी मुवक्किल से पूछा है कि उन्होंने किस तरह की टिप्पणियां की हैं? उन्होंने बिना सोचे-समझे सबके खिलाफ तरह-तरह की टिप्पणियां की हैं। क्या आपने उनकी बॉडी लैंग्वेज देखी है?” आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह बयान अदालत की नाराजगी को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
रामचंद्रन ने बचाव करते हुए जवाब दिया कि वह अतीत में आतंकवादी अजमल कसाब की ओर से भी पेश हो चुके हैं, और बजट आवंटन एक नीतिगत मामला है। इस पर न्यायमूर्ति नाथ ने तुरंत टिप्पणी की, “अजमल कसाब ने अदालत की अवमानना नहीं की, लेकिन आपके मुवक्किल ने की है।” यह एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी थी, जो अदालत की गंभीरता को दर्शाती है।
आवारा पशुओं के प्रबंधन पर शीर्ष अदालत की चिंता
इस पूरे मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पिछले पांच वर्षों से आवारा पशुओं से संबंधित नियमों के लागू न होने पर भी गहरी चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि आवारा कुत्तों का प्रबंधन एक गंभीर मुद्दा है और इसमें सरकारी एजेंसियों को अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की आवश्यकता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। अदालत की यह टिप्पणी दर्शाती है कि वह केवल अवमानना के मामले पर ही नहीं, बल्कि इस व्यापक सामाजिक समस्या पर भी ध्यान केंद्रित कर रही है। यह मामला अभी भी जारी है और आगे की सुनवाई में आवारा कुत्तों के प्रबंधन से जुड़े अन्य पहलुओं पर भी विचार किया जा सकता है।

