

Sitamarhi Fraud Case: डिजिटल युग में जहां हर सुविधा उंगलियों पर है, वहीं धोखेबाजों का जाल भी तेजी से बिछ रहा है। बिहार के सीतामढ़ी में एक ऐसे ही शातिर दिमाग को दबोचा गया है, जिसने फर्जीवाड़े और करोड़ों की ठगी से कई जिंदगियों को अंधेरे में धकेल दिया था।
Sitamarhi Fraud Case: करोड़ों की ठगी में शातिर महेश मुखिया गिरफ्तार
बिहार के सीतामढ़ी जिले से पुलिस ने करोड़ों की ठगी और जालसाजी के एक बड़े मामले का खुलासा किया है। सुप्पी प्रखंड के मोहनी मंडल गांव निवासी महेश मुखिया, जो खुद को महाराष्ट्र का डीजीपी बताता था, उसे बीती रात धर दबोचा गया। उसके पास से महाराष्ट्र के डीजीपी का एक फर्जी पहचान पत्र, विभिन्न बैंकों के 16 पासबुक, एक लैपटॉप और 1.50 लाख रुपये नकद बरामद किए गए हैं। आरोपी पर मुख्य रूप से टेंडर दिलाने के नाम पर 40 लाख रुपये की ठगी का आरोप है।
पुलिस के मुताबिक, महेश मुखिया ने नौकरी दिलाने, फैक्ट्री के टेंडर दिलवाने और पैसा दोगुना करने का लालच देकर मुजफ्फरपुर, भागलपुर, शिवहर सहित बिहार के कई जिलों के लोगों से करोड़ों रुपये हड़पे हैं। एसडीपीओ सदर-1 आलोक कुमार ने बताया कि यह गिरफ्तारी मुजफ्फरपुर के औराई निवासी सुधीर साहनी की शिकायत पर हुई है, जिनसे शातिर ने टेंडर दिलाने के बहाने लगभग 40 लाख रुपये ठग लिए थे। इसी मामले की गहन जांच के दौरान पुलिस ने महेश मुखिया को उसके घर से गिरफ्तार किया।
पुलिस टीम ने छापेमारी के दौरान आरोपी के घर से महत्वपूर्ण साक्ष्य जब्त किए हैं। इनमें 5 बैंकों के चेकबुक, सादे चेक, 9 डेबिट कार्ड और नेपाली सिम सहित 14 मोबाइल सिम शामिल हैं। बरामद लैपटॉप का इस्तेमाल जाली व्हाट्सएप अकाउंट बनाकर ठगी करने के लिए किया जाता था। इसके अलावा, एक डायरी भी मिली है जिसमें लेन-देन का पूरा हिसाब-किताब दर्ज है। यह स्पष्ट संकेत देता है कि यह ठगी केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित और विस्तृत जालसाजी का हिस्सा थी। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
नेपाल कनेक्शन और साइबर जालसाजी का पर्दाफाश
गिरफ्तारी के बाद पुलिस अब शातिर महेश मुखिया के आपराधिक इतिहास को खंगाल रही है। चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि वह नेपाल की धरती को भी अपने छिपने का ठिकाना बनाता रहा है। जानकारी के अनुसार, उसके गिरोह के कई सदस्य नेपाल में छिपकर रहते हैं और वहीं से अपनी गतिविधियों को अंजाम देते हैं। पुलिस बरामद नेपाली सिम कार्ड के जरिए उसके नेटवर्क का पता लगाने की कोशिश कर रही है।
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यह गिरोह जिस तरह से काम करता था, उसमें साइबर जालसाजी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। फर्जी पहचान पत्र और जाली व्हाट्सएप खातों के जरिए लोगों को फंसाना इनकी कार्यप्रणाली का हिस्सा था। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि महाराष्ट्र के डीजीपी का फर्जी पहचान पत्र बनाने में उसकी मदद किसने की और उसके इंटरनेट सहयोगी कौन-कौन हैं। यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या इस ठगी के पीछे कोई बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा था। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। पुलिस अधिकारी मानते हैं कि इस शातिर की गिरफ्तारी से कई और बड़े खुलासे हो सकते हैं और अन्य जिलों में ठगी के शिकार हुए लोगों को भी न्याय मिल सकता है। पुलिस इस मामले की हर बारीकी से जांच कर रही है ताकि सभी दोषियों को कानून के शिकंजे में लाया जा सके।





