

NCERT Book Ban: न्याय की दहलीज पर उठे सवालों की स्याही को मिटाने के लिए अब सर्वोच्च अदालत ने ही कलम उठाई है। एक ऐसी किताब, जिसने पाठ्यपुस्तकों के पवित्र पन्नों पर ही न्यायपालिका की निष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया था, उस पर अब पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है।
ब्रेकिंग: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, ‘ज्यूडिशियरी में करप्शन’ पर NCERT Book Ban, सभी प्रतियां जब्त
सुप्रीम कोर्ट ने लगाया NCERT Book Ban: क्या था विवाद?
NCERT Book Ban: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक ऐतिहासिक फैसले में NCERT की कक्षा 8 की सोशल साइंस पाठ्यपुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। इस किताब में ‘ज्यूडिशियरी में करप्शन’ (न्यायपालिका में भ्रष्टाचार) शीर्षक से एक हिस्सा शामिल था, जिसे लेकर गंभीर आपत्तियां उठाई गई थीं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए न सिर्फ किताब पर प्रतिबंध लगाया, बल्कि इसकी सभी भौतिक प्रतियों को तत्काल जब्त करने का भी आदेश दिया। यह फैसला बच्चों की शिक्षा में गुणवत्ता और संवेदनशीलता को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
पाठ्यक्रम में इस तरह के विवादास्पद विषय का शामिल होना शिक्षाविदों और कानूनी विशेषज्ञों के बीच बहस का मुद्दा बन गया था। ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ जैसे संवेदनशील मुद्दे को बच्चों की पाठ्यपुस्तक में किस तरीके से प्रस्तुत किया जाना चाहिए, इस पर गहन विचार-विमर्श की आवश्यकता थी। अदालत का मानना था कि जिस तरीके से इस विषय को पाठ्यपुस्तक में दर्शाया गया है, वह बच्चों के मन में न्यायपालिका के प्रति गलत धारणा उत्पन्न कर सकता है और उसकी गरिमा को धूमिल कर सकता है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
अदालत के इस कड़े रुख से स्पष्ट है कि शिक्षा प्रणाली में किसी भी जानकारी को शामिल करते समय उसकी सटीकता, प्रासंगिकता और प्रस्तुतिकरण की संवेदनशीलता पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। एनसीईआरटी जैसी प्रतिष्ठित संस्था से ऐसी चूक की अपेक्षा नहीं की जाती है। इस घटना ने एक बार फिर स्कूली शिक्षा में सामग्री के चयन और संपादन प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं।
CJI सूर्यकांत की पीठ का कड़ा फैसला
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि छात्रों को ऐसी जानकारी देना जो सत्यापित न हो या जो किसी संस्था की छवि को गलत तरीके से पेश करती हो, स्वीकार्य नहीं है। तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि बच्चे हमारे देश की महत्वपूर्ण संस्थाओं के प्रति सम्मान और विश्वास के साथ बड़े हों। इस मामले में न्यायालय ने संबंधित अधिकारियों को भविष्य में ऐसी सामग्री को शामिल करने से पहले उचित जांच और संपादन प्रक्रिया अपनाने का निर्देश भी दिया। इस प्रतिबंध से यह भी संदेश गया है कि बच्चों के पाठ्यक्रम में ऐसी कोई भी सामग्री नहीं होनी चाहिए जो उन्हें भ्रमित करे या उनके सामने गलत उदाहरण प्रस्तुत करे। यह फैसला देश में शैक्षिक मानकों को बनाए रखने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।



