back to top
⮜ शहर चुनें
जनवरी, 7, 2026

Ajmer Dargah: पीएम की चादर परंपरा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, याचिका खारिज

spot_img
spot_img
- Advertisement - Advertisement

Ajmer Dargah: न्याय के तराजू पर जब आस्था और इतिहास का पेंच उलझा, तो सर्वोच्च अदालत ने साफ कर दिया कि परंपराओं का सम्मान अपनी जगह है और अदालती दखल की सीमाएं अपनी। प्रधानमंत्री द्वारा अजमेर स्थित 13वीं शताब्दी के सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर राज्य प्रायोजित चादर चढ़ाने की प्रथा को चुनौती देने वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है।

- Advertisement -

Ajmer Dargah: पीएम की चादर परंपरा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, याचिका खारिज

Ajmer Dargah: क्या थी याचिका और क्यों हुई खारिज?

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि चूंकि चादर पहले ही चढ़ाई जा चुकी है, इसलिए यह मुद्दा अब निरर्थक हो गया है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यह ऐसा मामला नहीं है जिस पर न्यायालय कोई निर्णय दे सके। याचिकाकर्ताओं ने केंद्र सरकार, जिसमें प्रधानमंत्री भी शामिल हैं, को वार्षिक उर्स समारोह के तहत अजमेर दरगाह पर चादर जैसे औपचारिक सम्मान अर्पित करने से रोकने की मांग की थी। उनकी दलील थी कि ऐसे कार्य जनता की इच्छा, राष्ट्रीय संप्रभुता और भारतीय संविधान के मूलभूत मूल्यों के विपरीत हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

- Advertisement -

अजमेर शरीफ दरगाह पर औपचारिक ‘चादर’ चढ़ाने की परंपरा की शुरुआत पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1947 में की थी, जिसका पालन बाद के सभी प्रधानमंत्रियों द्वारा किया जाता रहा है। यह जनहित याचिका विश्व वैदिक सनातन संघ के अध्यक्ष जितेंद्र सिंह और हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने दायर की थी। याचिका में केंद्र सरकार द्वारा ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को दिए गए “राज्य-प्रायोजित औपचारिक सम्मान, आधिकारिक संरक्षण और प्रतीकात्मक मान्यता” को चुनौती दी गई थी।

- Advertisement -
यह भी पढ़ें:  Bihar News: पूर्व डीजीपी आलोक राज का BSSC अध्यक्ष पद से अचानक इस्तीफा, बिहार की राजनीति में मचा हड़कंप!

देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

याचिकाकर्ताओं ने ऐतिहासिक अभिलेखों का हवाला देते हुए आरोप लगाया था कि मोइनुद्दीन चिश्ती 12वीं शताब्दी में शहाबुद्दीन गोरी के आक्रमणों के दौरान भारत आए थे। उनका दावा था कि वह विदेशी विजय और धर्मांतरण अभियानों से जुड़े थे, जबकि उनकी दरगाह को संस्थागत रूप बहुत बाद में मिला। यह एक ऐसा ऐतिहासिक पक्ष है जिस पर आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। गहन चर्चा की आवश्यकता है।

ऐतिहासिक संदर्भ और याचिकाकर्ताओं के तर्क

ऐतिहासिक अभिलेखों से पता चलता है कि मोइनुद्दीन चिश्ती उन विदेशी आक्रमणों से जुड़े थे जिन्होंने दिल्ली और अजमेर पर विजय प्राप्त की और स्थानीय आबादी का बड़े पैमाने पर दमन और धर्मांतरण किया। ये कृत्य भारत की संप्रभुता, गरिमा और सभ्यतागत मूल्यों के बिल्कुल विपरीत थे, ऐसा याचिकाकर्ताओं का तर्क था। उनका मानना था कि ऐसे व्यक्ति को औपचारिक श्रद्धांजलि अर्पित करना संविधान की प्रस्तावना में निहित मूल्यों, जैसे न्याय, स्वतंत्रता, समानता और राष्ट्रीय अखंडता का हनन है और यह जनता की इच्छा की अवहेलना है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

सर्वोच्च न्यायालय ने इन ऐतिहासिक तर्कों की मेरिट पर जाने के बजाय याचिका के “निरर्थक” होने के आधार पर उसे खारिज कर दिया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि अदालत ऐसे मुद्दों में हस्तक्षेप करने से बच रही है जो पहले ही घटित हो चुके हों और जिनके लिए न्यायिक हस्तक्षेप का कोई तात्कालिक आधार न बचा हो। यह फैसला परंपराओं और कानूनी दायरे के बीच एक महत्वपूर्ण रेखा खींचता है।

- Advertisement -

जरूर पढ़ें

The Raja Saab: क्या प्रभास की फिल्म बॉक्स ऑफिस पर रच पाएगी नया इतिहास?

The Raja Saab News: सिनेमाई दुनिया में एक बार फिर तहलका मचाने आ रहे...

बिहार वन विभाग में बंपर वन रक्षक (Forest Guard Recruitment) भर्ती, ऐसे करें आवेदन!

Forest Guard Recruitment: सरकारी नौकरी की तलाश कर रहे...

सरकार के नाम पर 46715 रुपये खाते में आने की फर्जी खबर की पड़ताल

Fake News: सोशल मीडिया पर इन दिनों एक हैरान कर देने वाला दावा तेजी...

जियो रिचार्ज प्लान: अब मात्र ₹198 में पाएं हर दिन 2GB डेटा और अनलिमिटेड कॉलिंग!

Jio Recharge Plan: टेलीकॉम बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच, जियो अपने ग्राहकों के...
error: कॉपी नहीं, शेयर करें