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छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक Sign Language Verdict: सांकेतिक भाषा में दर्ज बयान अब दोषसिद्धि का आधार

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Sign Language Verdict: न्याय के तराजू में हर आवाज़ का वज़न बराबर होता है, फिर चाहे वो शब्दों से आए या इशारों से। एक ऐसे ही ऐतिहासिक फैसले में, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने सांकेतिक भाषा को न्यायिक मान्यता की मुहर लगा दी है।

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छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक Sign Language Verdict: सांकेतिक भाषा में दर्ज बयान अब दोषसिद्धि का आधार

सांकेतिक भाषा में गवाही का महत्व: Chhattisgarh High Court का बड़ा फैसला

सांकेतिक भाषा फैसला: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि सांकेतिक भाषा के दुभाषिए की मदद से दर्ज किए गए बयान आरोपी को दोषी ठहराने के लिए कानूनी रूप से पूरी तरह मान्य हैं। अदालत ने यह टिप्पणी एक शारीरिक रूप से सक्षम महिला के साथ हुए यौन उत्पीड़न मामले में दोषी व्यक्ति की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखते हुए की। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की दो सदस्यीय पीठ ने निचली अदालत के मार्च 2023 के फैसले को बरकरार रखते हुए आरोपी की अपील को खारिज कर दिया। उच्च न्यायालय ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि निचली अदालत ने पीड़िता की गवाही को सुगम बनाने के लिए हर संभव उचित कदम उठाए थे। जब पीड़िता को कुछ सवालों को समझने में दिक्कत हुई, तो निचली अदालत ने स्थिति को समझाने के लिए एक प्लास्टिक की गुड़िया का उपयोग किया और एक दुभाषिए को उसकी सहायता करने की अनुमति दी, आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह सुनिश्चित किया गया कि पीड़िता अपनी बात खुलकर कह सके। न्यायाधीशों ने पुष्टि की कि इस अभिनव विधि से पीड़िता के बयान का महत्व किसी भी तरह से कम नहीं हुआ, बल्कि इसने उसे अपनी आपबीती को अधिक स्पष्ट और सटीक रूप से व्यक्त करने में मदद की। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि किसी व्यक्ति की सुनने या बोलने में असमर्थता उसकी गवाही को अमान्य नहीं करती। यह दर्शाता है कि कानून दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों के प्रति कितना संवेदनशील है।

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न्याय के लिए हर आवाज़ है ज़रूरी

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सांकेतिक भाषा में दुभाषिए की सहायता से दिए गए बयान दोषसिद्धि का एक ठोस आधार बन सकते हैं। अदालत ने यह भी पाया कि ऐसा कोई संकेत नहीं था कि पीड़िता किसी मानसिक अक्षमता के कारण घटना को समझने या उसका वर्णन करने में असमर्थ थी। इसके विपरीत, अदालत ने पाया कि पीड़िता के हावभाव और बयान प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) और पुलिस को दिए गए उसके पहले के बयानों से पूरी तरह मेल खाते थे, जिनमें उसने अपने बहनोई को आरोपी के रूप में पहचाना था। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इस फैसले के साथ, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भारतीय न्याय प्रणाली समावेशी और सुलभ है, जहां हर व्यक्ति को न्याय पाने का समान अधिकार है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। न्याय की राह में भाषा की बाधा अब कोई रुकावट नहीं होगी।

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