
Hindi Bill Titles: जब देश की भाषाओं का गुलदस्ता हर रंग में खिलता है, तब कुछ फैसले उसे फीका करने का डर पैदा कर जाते हैं। केंद्र सरकार के विधेयकों के शीर्षकों में हिंदी शब्दों के बढ़ते इस्तेमाल पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने इसे गैर-हिंदी भाषी राज्यों और लोगों के लिए “अपमानजनक” करार दिया है, जो भाषाई विविधता पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
गैर-हिंदी भाषियों का अपमान: क्या Hindi Bill Titles देश की भाषाई विविधता को मिटा रहे हैं?
विधेयकों के Hindi Bill Titles पर चिदंबरम का कड़ा प्रहार
पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने सोमवार देर रात एक बयान में संसद में पेश किए जा रहे विधेयकों के शीर्षकों में हिंदी शब्दों को अंग्रेजी अक्षरों में लिखने की सरकार की ‘बढ़ती प्रवृत्ति’ का कड़ा विरोध किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि गैर-हिंदी भाषी लोग इन विधेयकों/अधिनियमों के शीर्षक को अंग्रेजी अक्षरों में लिखे होने पर भी पहचान नहीं सकते और उनका उच्चारण भी नहीं कर सकते, आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
चिदंबरम ने याद दिलाया कि अब तक यह परंपरा रही है कि विधेयक के अंग्रेजी संस्करण में शीर्षक अंग्रेजी शब्दों में और हिंदी संस्करण में हिंदी शब्दों में लिखा जाता था। इस स्थापित परंपरा में 75 वर्षों से किसी को कोई दिक्कत नहीं आई, तो सरकार को यह बदलाव क्यों करना चाहिए, आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। पूर्व केंद्रीय मंत्री ने सवाल किया। यह बदलाव गैर-हिंदी भाषी लोगों और उन राज्यों का अपमान है जिनकी आधिकारिक भाषा हिंदी के अलावा कोई अन्य है।
चिदंबरम ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि विभिन्न सरकारों ने लगातार यह दोहराया है कि अंग्रेजी एक सहयोगी राजभाषा बनी रहेगी। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि यह वादा अब टूटने की कगार पर है, जिससे देश की भाषाई सद्भाव पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यह एक ऐसा मुद्दा है जो न केवल भाषाई पहचान से जुड़ा है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों और संघीय ढांचे की भावना को भी छूता है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
भाषाई सामंजस्य और सरकारी वादे
कांग्रेस सांसद ने सरकार की इस नीति को देश की समृद्ध भाषाई विरासत के लिए खतरा बताया। उन्होंने कहा कि यह महज शब्दों का खेल नहीं, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक और राजनीतिक संवेदनशीलता का विषय है। भारत जैसे बहुभाषी देश में, जहां हर भाषा का अपना महत्व और पहचान है, ऐसे कदम गैर-हिंदी भाषियों के बीच अलगाव की भावना पैदा कर सकते हैं। यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि सभी नागरिकों को कानून और सरकारी कामकाज की भाषा तक समान पहुंच मिले, ताकि किसी को भी हीनता या अनदेखी का अनुभव न हो। सरकार को अपनी राजभाषा नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए ताकि देश की विविधता और एकता अक्षुण्ण बनी रहे।




