
Nuclear Energy: दिल्ली की राजनीतिक सरगर्मी में एक नए तूफ़ान ने दस्तक दी है। जैसे शतरंज की बिसात पर कोई राजा अपनी चालें चल रहा हो, वैसे ही कांग्रेस ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
Nuclear Energy: संसद में शांति विधेयक पर क्यों उठे सवाल?
कांग्रेस के दिग्गज नेता और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने शनिवार को नरेंद्र मोदी सरकार पर जोरदार हमला बोला। उन्होंने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि सतत परमाणु ऊर्जा संवर्धन और विकास विधेयक (शांति) को संसद में जबरन पारित कराया गया है। रमेश का दावा है कि इस विधेयक को अमेरिकी हितों की पूर्ति के लिए पास किया गया, ताकि प्रधानमंत्री अपने एक ‘पुराने दोस्त’ (बिना नाम लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर इशारा) के साथ शांति समझौते को फिर से बहाल कर सकें। रमेश की यह तीखी प्रतिक्रिया अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा हाल ही में वित्त वर्ष 2026 के लिए राष्ट्रीय रक्षा प्राधिकरण अधिनियम (NDAA) पर हस्ताक्षर करने के बाद आई है, जिसमें विशेष रूप से परमाणु दायित्व नियमों पर भारत और अमेरिका के बीच संयुक्त आकलन का उल्लेख है।
रमेश ने अपने बयान में जोर देकर कहा कि इन घटनाक्रमों से संसद में शांति विधेयक को जल्दबाजी में पारित कराने के पीछे का असली मकसद उजागर हो गया है। उन्होंने X (पहले ट्विटर) पर अमेरिकी कानून के उस खंड का स्क्रीनशॉट साझा किया, जिसमें परमाणु दायित्व मानदंडों को संरेखित करने के लिए भारत के साथ परामर्श का जिक्र है। यह अमेरिकी कानून 3,000 से अधिक पृष्ठों का है और इसमें यह विशेष खंड शामिल है। उन्होंने पोस्ट किया, ‘राष्ट्रपति ट्रंप ने अभी-अभी अमेरिकी वित्तीय वर्ष 2026 के लिए राष्ट्रीय रक्षा प्राधिकरण अधिनियम पर हस्ताक्षर किए हैं। यह अधिनियम 3,100 पृष्ठों का है। पृष्ठ 1,912 पर संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के बीच परमाणु दायित्व नियमों पर संयुक्त मूल्यांकन का उल्लेख है।’ आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
विधेयक पारित करने की असली वजह क्या?
रमेश के अनुसार, इन तथ्यों से यह बिलकुल स्पष्ट हो गया है कि सरकार ने इसी सप्ताह की शुरुआत में शांति विधेयक को इतनी जल्दी क्यों पारित करने का फैसला किया। उन्होंने कहा, ‘अब हमें पुख्ता तौर पर पता चल गया है कि प्रधानमंत्री ने इस सप्ताह की शुरुआत में शांति विधेयक को संसद में इतनी जल्दी क्यों पारित करवाया, जिसमें अन्य बातों के अलावा, परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम, 2010 के प्रमुख प्रावधानों को भी समाप्त कर दिया गया है। यह शांति विधेयक को अपने पुराने मित्र के साथ फिर से स्थापित करने के लिए था।’ यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है जब देश एक महत्वपूर्ण संसदीय सत्र से गुजर रहा था, और इतने बड़े विधेयक को लेकर आम सहमति बनाने की बजाय जल्दबाजी दिखाई गई। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
विश्लेषकों का मानना है कि इस विधेयक के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं, खासकर भारत की संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर। सरकार पर लगातार पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग बढ़ती जा रही है, विशेषकर ऐसे मामलों में जो राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़े हों। कांग्रेस लगातार इस मुद्दे पर सरकार से स्पष्टीकरण की मांग कर रही है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।






