



देहरादून न्यूज़: भारत चीन संबंध: इतिहास की परतें अक्सर वर्तमान के सवालों के जवाब देती हैं, और कूटनीति के पन्नों में लिखे फैसले आज भी हमारे सामरिक भविष्य की इबारत गढ़ते हैं। रक्षा प्रमुख अनिल चौहान ने हाल ही में भारत-चीन संबंधों के एक ऐसे ही महत्वपूर्ण अध्याय पर प्रकाश डाला है, जो दशकों पहले दोनों देशों के बीच संबंधों की दिशा तय करने वाला था।
रक्षा प्रमुख अनिल चौहान ने खोले भारत चीन संबंध पर पंचशील समझौते के अनछुए पहलू
भारत चीन संबंध: पंचशील समझौता और नेहरू की दूरदृष्टि
स्वतंत्रता के बाद भारत को अपनी सीमाओं का निर्धारण स्वयं करना था, और इसी चुनौती के बीच 1954 का पंचशील समझौता एक मील का पत्थर साबित हुआ। इस समझौते के तहत भारत ने तिब्बत को चीन का अभिन्न अंग स्वीकार किया, जिसका उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना और दोनों देशों के बीच सहयोग के नए रास्ते खोलना था। यह समझौता भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और चीन के प्रधानमंत्री झोउ एनलाई के बीच हुआ था, जिसमें शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांतों को आधार बनाया गया था। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
देहरादून में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जनरल चौहान ने बताया कि अंग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद, देश को अपनी सीमाओं का स्वयं निर्धारण करना पड़ा था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्रधानमंत्री नेहरू भारत के उन दावों से भली-भांति अवगत थे, जिनमें पूर्व में मैकमोहन रेखा और लद्दाख के कुछ क्षेत्र शामिल थे। हालांकि, उनका मानना था कि पंचशील के व्यापक ढांचे के माध्यम से एक बेहतर समझ स्थापित करना संबंधों को स्थिर करने में सहायक हो सकता है।
सीडीएस ने आगे स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता के पश्चात, ब्रिटिश शासन के अंत के साथ, यह भारत को तय करना था कि उसकी सीमाएँ कहाँ तक विस्तारित हैं। नेहरू शायद इस बात से भी अवगत थे कि पूर्व में मैकमोहन रेखा जैसी हमारी कुछ सीमाएँ थीं और लद्दाख क्षेत्र में भी हमारा कुछ दावा था, लेकिन वह यहाँ नहीं है। इसलिए शायद वे पंचशील समझौते के लिए आगे बढ़ना चाहते थे। लगभग 890 किलोमीटर लंबी यह मैकमोहन रेखा पूर्वी क्षेत्र में ब्रिटिश भारत और तिब्बत के बीच एक महत्वपूर्ण सीमा के रूप में कार्य करती थी।
तिब्बत का विलय और क्षेत्रीय स्थिरता की चीन की चाहत
जनरल चौहान ने यह भी कहा कि तिब्बत की तथाकथित मुक्ति के बाद, चीन इस क्षेत्र में स्थिरता स्थापित करना चाहता था। चीन के लिए भी, जब उन्होंने तिब्बत को ‘मुक्त’ कराया और ल्हासा व शिनजियांग में प्रवेश किया, तो ये क्षेत्र दोनों सिरों पर बेहद अशांत थे। इसलिए, इस क्षेत्र को प्राथमिकता दी गई थी और चीन यहाँ स्थिरता चाहता था। स्वतंत्र भारत भी चीन के साथ बेहतर संबंध स्थापित करने के लिए उत्सुक था। 1954 में, भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
दोनों देशों ने पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ ही, भारत ने यह मान लिया कि उसने अपनी उत्तरी सीमा, जो एकमात्र ऐसा क्षेत्र था जिसे हम औपचारिक संधि के माध्यम से सुलझा नहीं पाए थे, का समाधान कर लिया है। यह एक ऐसा ऐतिहासिक निर्णय था जिसने दोनों देशों के बीच एक नए युग की नींव रखी, भले ही भविष्य में संबंधों ने कई मोड़ लिए। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।






