
भारत के हथियार आयात: युद्ध की विभीषिका में हर देश अपनी सुरक्षा का कवच मजबूत करना चाहता है, और इस दौड़ में भारत भी पीछे नहीं। हथियारों का बाजार एक ऐसा सागर है जहां लहरें कभी शांत नहीं होतीं।
भारत के हथियार आयात: दुनिया में दूसरे नंबर पर भारत, रूस पर घटी निर्भरता, फ्रांस और इज़राइल का बढ़ा दबदबा
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एसआईपीआरआई) की नवीनतम रिपोर्ट ने एक बार फिर इस बात पर मुहर लगा दी है कि भारत 2021 से 2025 के बीच दुनिया के प्रमुख हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा आयातक बना हुआ है, जिसकी वैश्विक हिस्सेदारी 8.2% है। यह दर्शाता है कि भारत के हथियार आयात वैश्विक रक्षा व्यापार में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, हालांकि ‘मेक-इन-इंडिया’ पहल के तहत स्वदेशी हथियार निर्माण को मिल रहे प्रोत्साहन के कारण कुल आयात में मामूली 4% की गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट 2016-2020 के चक्र की तुलना में दर्ज की गई है।
भारत के हथियार आयात: रूस की हिस्सेदारी में ऐतिहासिक गिरावट
रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण बदलाव भी उजागर हुआ है: हथियारों की आपूर्ति के लिए रूस पर भारत की दशकों पुरानी निर्भरता में भारी कमी आई है। एसआईपीआरआई की रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि जहां 2011-15 की अवधि में मॉस्को की भारत को आपूर्ति में 70% की हिस्सेदारी थी, वहीं 2021-25 में यह घटकर लगभग 40% रह गई है। इस बदलाव का सबसे अधिक लाभ फ्रांस और इज़राइल को मिला है, जिनकी हिस्सेदारी में क्रमशः 29% और 15% तक की वृद्धि हुई है। यह दर्शाता है कि भारत अब अपनी रक्षा जरूरतों के लिए विभिन्न आपूर्तिकर्ताओं की ओर देख रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह कमी आंशिक रूप से भारत की अपने हथियारों को डिजाइन और उत्पादन करने की बढ़ती क्षमता के कारण है, आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। हालांकि, घरेलू उत्पादन में अक्सर काफी देरी होती है। 2021-25 में यूक्रेन 9.7% हिस्सेदारी के साथ दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक रहा।
रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि भारत का शस्त्रागार मुख्य रूप से चीन और पाकिस्तान से उत्पन्न दोहरे खतरे से प्रेरित है। एसआईपीआरआई के विश्लेषकों का कहना है कि दक्षिण एशिया में, भारत द्वारा हथियारों का भारी मात्रा में आयात मुख्य रूप से चीन से संभावित खतरे और चीन से हथियारों के निर्यात के प्रमुख प्राप्तकर्ता पाकिस्तान के साथ भारत के लंबे समय से चल रहे संघर्ष के कारण है। 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए संघर्ष में भी आयातित हथियारों का इस्तेमाल किया गया था, दोनों ही परमाणु-सशस्त्र देश हैं।
आत्मनिर्भरता की राह और भविष्य के रक्षा सौदे
भारत के आयात में यह रुझान आने वाले वर्षों में भी जारी रहने की संभावना है, खासकर पश्चिमी देशों के साथ कई बड़े रक्षा सौदों की संभावना को देखते हुए। इनमें फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमान (लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये की लागत), जर्मनी से छह वायु-स्वतंत्र प्रणोदन (एआईपी) से लैस पारंपरिक पनडुब्बियां, अमेरिका से छह अतिरिक्त पी-8आई पोसाइडन समुद्री गश्ती विमान और इज़राइल के साथ मिसाइल रक्षा प्रणालियों और ड्रोन पर कई अहम रक्षा सौदे शामिल हैं। इन बड़े रक्षा सौदों से भारत की सैन्य क्षमता को और मजबूती मिलेगी। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
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यह महत्वपूर्ण है कि देश अपनी रक्षा क्षमता को मजबूत करते हुए ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य की ओर भी लगातार बढ़ रहा है। घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना और विभिन्न स्रोतों से सैन्य उपकरणों की खरीद एक संतुलित रणनीति का हिस्सा है। आने वाले समय में भारत की यह रणनीति वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य में उसकी स्थिति को और मजबूत करेगी। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।



