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मार्च, 18, 2026
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Decolonization of India: राष्ट्रपति भवन से हटी लुटियंस की मूर्ति, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की प्रतिमा स्थापित; क्यों अहम है यह कदम?

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Decolonization of India: आज़ादी के 75 बसंत बीत गए, मगर कुछ ‘साहब’ अब तक हमारे दिलों-दिमाग में टंगे हुए थे। अब उन्हीं पुरानी स्मृतियों के बोझ को हल्का करने का वक्त आ गया है। इस दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए राष्ट्रपति भवन से ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस की प्रतिमा हटा ली गई है।

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Decolonization of India: क्या राष्ट्रपति भवन से लुटियंस की मूर्ति हटना भारत के वि-उपनिवेशीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम है?

राष्ट्रपति भवन से लुटियंस की विदाई: एक बड़ा Decolonization of India कदम

भारत को 1947 में मिली आज़ादी को दशकों बीत गए हैं, फिर भी ब्रिटिश औपनिवेशिक मानसिकता के कई प्रतीक आज भी हमारे परिवेश में मौजूद हैं। इसी औपनिवेशिक विरासत को मिटाने की दिशा में 24 फरवरी 2026 को एक महत्वपूर्ण पहल की गई। लगभग 79 वर्षों तक राष्ट्रपति भवन में शोभायमान ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस की प्रतिमा को हटा लिया गया। इस प्रतिमा के नीचे ‘Edwin Lutyens, Architect of this House’ अंकित था। अब इसे बुराड़ी स्थित कोरोनेशन पार्क में स्थानांतरित कर दिया जाएगा, जो ब्रिटिश शासन की कई स्मृतियों का एक ‘संग्रहालय’ या कहें ‘कब्रिस्तान’ बन चुका है। यहां पहले से ही किंग जॉर्ज पंचम, लॉर्ड हार्डिंग, लॉर्ड चेम्सफोर्ड और लॉर्ड विलिंगडन जैसे ब्रिटिश शख्सियतों की मूर्तियां स्थापित हैं। राष्ट्रपति भवन में लुटियंस की यह मूर्ति अप्रैल 1947 में स्थापित की गई थी, जब लॉर्ड माउंटबेटन ने 21 फरवरी 1947 को भारत के वायसराय का पदभार संभालने के तुरंत बाद वायसराय हाउस (वर्तमान राष्ट्रपति भवन) में इसे लगाने का आदेश दिया था। एडविन लुटियंस 1912 में दिल्ली आ गए थे, जब इसे भारत की राजधानी बनाने का निर्णय लिया गया था, और 1930 तक यहीं रहे।

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इसी क्रम में ‘राजाजी उत्सव’ के शुभ अवसर पर राष्ट्रपति भवन के सेंट्रल कोर्टयार्ड में भारत के पहले और आखिरी भारतीय गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की प्रतिमा स्थापित की गई। इसके साथ ही, 24 फरवरी से 1 मार्च तक उनके जीवन पर आधारित एक विशेष प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। यह कदम औपनिवेशिक अवशेषों को हटाने और देश की अपनी पहचान स्थापित करने की दिशा में एक मील का पत्थर है। यह एक दिलचस्प संयोग है कि एडविन लुटियंस 1917 के आसपास 10 हेस्टिंग्स रोड (जो अब राजाजी मार्ग के नाम से जाना जाता है) के बंगले में रहते थे। बाद में इसी बंगले में सी. राजगोपालाचारी ने भी निवास किया, और इसी वजह से इस सड़क का नाम उनके सम्मान में राजाजी मार्ग रखा गया।

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कौन थे चक्रवर्ती राजगोपालाचारी?

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, जिन्हें ‘राजाजी’ के नाम से भी जाना जाता है, कई मायनों में एक असाधारण व्यक्तित्व थे। वह न केवल स्वतंत्र भारत के पहले और एकमात्र भारतीय गवर्नर जनरल रहे, बल्कि एक उत्कृष्ट नेता, प्रसिद्ध वकील, शानदार लेखक और हिंदी के प्रबल समर्थक भी थे। C. राजगोपालाचारी का जन्म मद्रास प्रेसीडेंसी के थोरापल्ली गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम चक्रवर्ती वेंकटरमन अय्यर था। पांच वर्ष की आयु में उनका परिवार होसुर चला गया, जहां उनकी प्रारंभिक शिक्षा एक सरकारी स्कूल में हुई। उन्होंने 1894 में बेंगलुरु के सेंट्रल कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और 1898 में मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज से कानून की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने 1897 में शादी की।

28 वर्ष की आयु में, वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े। महात्मा गांधी के छुआछूत विरोधी आंदोलन और हिंदू-मुस्लिम एकता के कार्यक्रमों से वे गहराई से प्रभावित हुए, जिसके बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हो गए और गांधीजी के प्रबल अनुयायी बन गए। 1930 में, जब गांधीजी ने दांडी मार्च किया, तो राजगोपालाचारी ने नागपट्टनम में नमक कानून का उल्लंघन किया, जिसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा। उन्होंने मंदिरों में दलित समुदाय के प्रवेश पर प्रतिबंध का भी पुरजोर विरोध किया, जिसके परिणामस्वरूप अंततः मंदिरों में दलितों का प्रवेश संभव हो सका। गांधीजी के असहयोग आंदोलन का उन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने अपनी स्थापित वकालत छोड़ दी और खादी अपना ली। उनकी वकालत इतनी सफल थी कि वे सेलम, तमिलनाडु में कार खरीदने वाले पहले वकील बने थे। महात्मा गांधी भी राजगोपालाचारी से अत्यधिक प्रभावित थे; वे उन्हें अपना ‘विवेक जागृत रखने वाला’ (conscience keeper) कहते थे। गांधीजी ने ही उन्हें ‘राजाजी’ का उपनाम दिया था।

मद्रास प्रांत के प्रीमियर से हिंदी प्रेम तक का सफर

1937 में, कांग्रेस ने मद्रास प्रोविंशियल असेंबली का चुनाव जीता। उस समय तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश का अधिकांश हिस्सा मद्रास प्रांत का हिस्सा था। राजगोपालाचारी को मद्रास प्रांत का प्रीमियर (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया गया। हालांकि, जब उन्होंने प्रांत में हिंदी को बढ़ावा देने का प्रयास किया, तो हिंसक विरोध प्रदर्शन भड़क उठे। राजगोपालाचारी ने 6 मई 1937 को प्रसिद्ध तमिल पत्रिका ‘सुदेश मित्र’ में अपने एक लेख में लिखा था कि “जब हम हिंदी सीख लेंगे, तभी दक्षिण भारत को सम्मान हासिल होगा।” उस समय दक्षिण भारत में हिंदी के प्रसार में उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली, लेकिन उन्होंने अपने प्रयासों को जारी रखा और हार नहीं मानी। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। भले ही वे दक्षिण में हिंदी को वांछित मुकाम नहीं दिला पाए, लेकिन उन्होंने इसके प्रचार-प्रसार में कोई कसर नहीं छोड़ी।

राजाजी को महात्मा गांधी के सबसे करीबी और विश्वसनीय सलाहकारों में से एक माना जाता था। दोनों के बीच इतने प्रगाढ़ संबंध थे कि गांधीजी अक्सर किसी भी गंभीर मामले पर सलाह लेने के लिए राजाजी को ही याद करते थे। दोनों नेताओं के बीच आपसी विश्वास इतना गहरा था कि राजाजी ने अपनी बेटी लक्ष्मी को गांधीजी के वर्धा आश्रम में रहने के लिए भेज दिया। आश्रम में रहते हुए ही लक्ष्मी और गांधीजी के छोटे बेटे देवदास के बीच प्रेम संबंध विकसित हुआ। देवदास उस समय 28 वर्ष के थे और लक्ष्मी 15 वर्ष की थीं। बाद में दोनों का विवाह संपन्न हुआ, और इस प्रकार राजाजी और गांधीजी समधी बन गए।

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नेहरू से मतभेद और स्वतंत्र पार्टी का उदय

इसके बाद, 1952 से 1954 के दौरान, राजगोपालाचारी एक बार फिर मद्रास प्रांत के मुख्यमंत्री बने। इस कार्यकाल में उन्होंने माध्यमिक स्तर की शिक्षा में हिंदी को अनिवार्य करने का प्रयास किया। हालांकि, तमिल समुदाय के तीव्र हिंदी-विरोध के कारण यह प्रयास केवल कागजों तक ही सीमित रहा। उधर, राजगोपालाचारी न केवल नेहरू की आर्थिक नीतियों से असंतुष्ट होने लगे थे, बल्कि उन्हें नेहरू और कांग्रेस की बदलती कार्यशैली भी नापसंद आने लगी थी। नेहरू से उनके गहरे मतभेद बढ़ते चले गए। नेहरू और कांग्रेस से मतभेद के कारण, आचार्य जे.बी. कृपलानी, जो स्वतंत्रता प्राप्ति के समय कांग्रेस अध्यक्ष थे, ने भी 1951 में पार्टी छोड़ दी थी, और अब राजगोपालाचारी भी उन्हीं सवालों को उठा रहे थे। 1957 में एक सेमिनार में भाग लेते हुए, राजगोपालाचारी ने यहां तक कहा था कि “62 साल पहले देश में शासन तंत्र के खिलाफ एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए एक पार्टी का गठन हुआ था और इसी तरह आज भी ऐसी ही एक पार्टी की जरूरत है।” उन्होंने लोकतंत्र में विपक्ष के महत्व को समझाते हुए कहा, “बिना विपक्ष के लोकतंत्र ऐसा ही होता है जैसे कि किसी गधे की पीठ पर एक ही तरफ कपड़ों का गठ्ठर लाद दिया जाए।” आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। स्वतंत्र पार्टी ने 1962 में अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ा और 18 सीटें जीतीं। बिहार सहित कई राज्यों की विधानसभाओं में उसे मुख्य विपक्षी दल का दर्जा भी हासिल हुआ, क्योंकि लोगों का समर्थन उनके प्रति था। 1967 के चुनाव में कांग्रेस को 283 सीटें मिली थीं, जबकि दूसरे नंबर की पार्टी स्वतंत्र पार्टी को लोकसभा की 44 सीटें मिलीं। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

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