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जनवरी, 16, 2026
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Varanasi News: मणिकर्णिका घाट पर ‘विरासत’ बनाम ‘विकास’ की जंग, अहिल्याबाई की मूर्ति पर हंगामा!

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Varanasi News: अक्सर विकास की डगर पर विरासत के पांव लड़खड़ा जाते हैं, और जब बात आस्था के केंद्र की हो तो चिंगारी भड़कना स्वाभाविक है। काशी की धरती पर इन दिनों कुछ ऐसा ही हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में स्थित ऐतिहासिक मणिकर्णिका घाट पर चल रहे पुनरुद्धार और पुनर्विकास कार्य को लेकर गहरा विवाद खड़ा हो गया है।

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वाराणसी समाचार: मणिकर्णिका घाट पर ‘विरासत’ बनाम ‘विकास’ की जंग, अहिल्याबाई की मूर्ति पर हंगामा!

वाराणसी समाचार: प्रशासन का पक्ष और विरोध के स्वर

घाट पर चल रहे निर्माण और अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान देवी अहिल्याबाई होलकर की लगभग सौ वर्ष पुरानी प्रतिमा को नुकसान पहुँचाने के आरोपों ने स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक हलचल मचा दी है। जहाँ प्रशासन इसे एक गलतफहमी करार दे रहा है, वहीं विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों के साथ-साथ राजनीतिक दलों ने इसे विरासत और आस्था पर सीधा हमला बताया है।

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वाराणसी में पाल समाज समिति के सदस्यों ने विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व किया, जिसमें आरोप लगाया गया कि पुनरुद्धार के नाम पर मणिकर्णिका घाट के मूल स्वरूप से बिना किसी पूर्व सूचना के छेड़छाड़ की जा रही है। उन्होंने कहा कि इसी क्रम में देवी अहिल्याबाई होलकर की ऐतिहासिक मूर्ति को या तो हटा दिया गया है या क्षतिग्रस्त किया गया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह प्रतिमा केवल पत्थर की नहीं, बल्कि उनके समुदाय की आस्था और इतिहास का जीवंत प्रतीक है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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प्रदर्शन को मराठी समुदाय, धनगर समाज और अन्य स्थानीय समूहों का भी समर्थन मिल रहा है। सनातन रक्षक दल के अध्यक्ष अजय शर्मा ने गंभीर आरोप लगाए कि घाट पर कई प्रतिष्ठित और प्राण प्रतिष्ठित मूर्तियों को मशीनों से तोड़ा गया। उन्होंने जोर देकर कहा कि जिन प्रतिमाओं में प्राण प्रतिष्ठा की जाती है, उन्हें जीवित माना जाता है, और इस तरह का ध्वस्तीकरण सीधे तौर पर धार्मिक भावनाओं का अपमान है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि मूर्तियों को बाद में दोबारा स्थापित भी किया जाएगा, तो उनकी धार्मिक शुचिता कैसे बनी रहेगी।

वहीं, दूसरी ओर, प्रशासन ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। वाराणसी के जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार ने स्पष्ट किया है कि मणिकर्णिका घाट पर चल रहे कार्यों का एकमात्र उद्देश्य सुविधाओं में सुधार, स्वच्छता सुनिश्चित करना और स्थान प्रबंधन को बेहतर बनाना है। उन्होंने बताया कि निर्माण के दौरान जो भी कलाकृतियाँ या मूर्तियाँ अस्थायी रूप से हटाई गई हैं, उन्हें संस्कृति विभाग द्वारा सुरक्षित स्थान पर रखा गया है, और कार्य पूर्ण होने के बाद उन्हें उनके मूल रूप में सम्मानपूर्वक पुनः स्थापित किया जाएगा। जिलाधिकारी ने यह भी दोहराया कि किसी भी मंदिर को न तो तोड़ा गया है और न ही जानबूझकर कोई नुकसान पहुँचाया गया है।

मौके पर मौजूद उपजिलाधिकारी आलोक वर्मा ने कहा कि घाट और उसके आसपास रहने वाले अधिकांश लोग इन कार्यों का विरोध नहीं कर रहे हैं। उन्होंने यह आशंका भी जताई कि विरोध प्रदर्शनों में कुछ बाहरी तत्व शामिल हो सकते हैं। प्रशासन और पुलिस स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और शांति व्यवस्था सुनिश्चित कर रही है। यह विवाद एक बार फिर से हमारी धार्मिक विरासत के संरक्षण और आधुनिकीकरण के बीच के संवेदनशील संतुलन को रेखांकित करता है।

विवाद की आंच इंदौर से दिल्ली तक

इस विवाद ने केवल वाराणसी तक ही सीमित न रहकर, मध्य प्रदेश के इंदौर में भी तीखी प्रतिक्रिया पैदा की है। इंदौर में अहिल्याबाई होलकर की विरासत को गहरी श्रद्धा से देखा जाता है। वहाँ के नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने दावा किया है कि मणिकर्णिका घाट पर अहिल्याबाई द्वारा निर्मित या पुनर्स्थापित प्राचीन मंदिरों और प्रतिमाओं को नुकसान पहुँचाया गया है। होलकर वंश के वंशज यशवंतराव होलकर भी इस पूरे मामले की पड़ताल करने वाराणसी पहुँचे और उन्होंने गहन जाँच तथा पूर्ण पुनर्स्थापना की मांग की।

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आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। राजनीतिक स्तर पर भी यह मुद्दा गरमा गया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला करते हुए आरोप लगाया कि सौंदर्यीकरण और व्यावसायीकरण के नाम पर सदियों पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर को मिटाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि मणिकर्णिका घाट का उल्लेख गुप्त काल से मिलता है और बाद में देवी अहिल्याबाई होलकर ने इसका पुनरुद्धार कराया था। ऐसे में इसे तोड़ना काशी की आत्मा पर आघात है। मल्लिकार्जुन खरगे ने यह भी कहा कि पहले काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के नाम पर छोटे-बड़े मंदिर और देवालय तोड़े गए और अब प्राचीन घाटों की बारी है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इस सबके पीछे फिर से व्यावसायिक मित्रों को फायदा पहुँचाने की मंशा है।

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खरगे ने देश की जनता से दो महत्वपूर्ण सवाल पूछे। पहला, क्या जीर्णोद्धार, साफ-सफाई और सौंदर्यीकरण का काम विरासत को सहेजे बिना नहीं हो सकता था? उन्होंने याद दिलाया कि कैसे संसद परिसर से महात्मा गांधी और बाबासाहेब आंबेडकर सहित भारत की महान हस्तियों की प्रतिमाओं को बिना किसी विचार-विमर्श के एक कोने में रखवा दिया गया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जलियांवाला बाग स्मारक की दीवारों से इतिहास से हमारे स्वतंत्रता सेनानियों की कुर्बानियों को इसी पुनरुद्धार के नाम पर मिटाया गया। दूसरा सवाल करते हुए खरगे ने पूछा, मणिकर्णिका घाट में बुलडोजर का शिकार बनीं सैकड़ों साल पुरानी मूर्तियों पर कुल्हाड़ी चलाकर उन्हें मलबे में क्यों डाला गया, क्या उन्हें किसी संग्रहालय में संभाल कर नहीं रखा जा सकता था? उन्होंने कहा, “आपने दावा किया था- ‘माँ गंगा ने बुलाया है।’ आज आपने माँ गंगा को भुला दिया है। बनारस के घाट बनारस की पहचान हैं। क्या आप इन घाटों को जनता की पहुँच से दूर करना चाहते हैं?” देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

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उन्होंने अंत में कहा कि लाखों लोग मोक्ष प्राप्ति के लिए अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में हर वर्ष काशी आते हैं। क्या सरकार की मंशा इन श्रद्धालुओं से विश्वासघात करने की है? कांग्रेस के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने भी इस घटना को सनातन संस्कृति पर हमला बताया है। यह स्पष्ट है कि इस मुद्दे पर राजनीतिक घमासान जारी रहेगा और सरकार को धार्मिक विरासत के संरक्षण पर और अधिक ध्यान देना होगा।

संतुलन की चुनौती: विकास और आस्था का संगम

उधर, भाजपा सूत्रों के अनुसार, यह मामला प्रधानमंत्री कार्यालय और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यालय तक पहुँच चुका है। प्रशासन की ओर से भरोसा दिलाया गया है कि पुनर्विकास के साथ-साथ विरासत का संरक्षण भी प्राथमिकता रहेगी और सभी मूर्तियों तथा कलाकृतियों को सम्मानपूर्वक पुनः स्थापित किया जाएगा। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

मणिकर्णिका घाट हिंदू धर्म के सबसे प्राचीन और पवित्र श्मशान स्थलों में से एक है, और यह मान्यता है कि यहाँ अंतिम संस्कार से मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसे में यहाँ किसी भी प्रकार का निर्माण या बदलाव अत्यंत संवेदनशील विषय बन जाता है। वर्तमान विवाद ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि विकास और विरासत के बीच संतुलन कैसे साधा जाए, ताकि आधुनिक सुविधाओं के साथ-साथ आस्था, इतिहास और संस्कृति भी सुरक्षित रह सके।

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