


दैनिक जागरण के पूर्व संपादक शैलेंद्र दीक्षित (Shailendra Dixit) का निधन हो (senior-journalist-shailendra-dixit-passes-away) गया है। पत्रकारिता के पितामह शैलेंद्र दीक्षित नहीं रहे। यह खबर सुनते ही हर कोई स्तब्ध हो गया।
सोमवार को उन्होंने आखिरी सांस ली। दैनिक आज और दैनिक जागरण में अपने पत्रकारिता करियर का अधिकतम समय व्यतीत करने वाले शैलेंद्र दीक्षित खासे लोकप्रिय रहे हैं। आज पत्रकारिता से लेकर राजनीतिक गलियारों से होकर साहित्य जगत हर जगह एक सूनापन छा गया है।
कानपुर में आज सोमवार को हृदय गति रुकने से उनका निधन हो गया। उनकी अंत्येष्टि 22 फरवरी को पूर्वान्ह 11 बजे भगवतदास घाट पर होगी। उनके निधन की खबर सुनते ही उनके आवास पर शोक संवेदना व्यक्त करने वालों का तांता लग गया।
वह अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन, ताउम्र वह कितनों को याद आएंगे, गिनती नहीं बता सकता। खबरों से, खबरों के लिए वे सदैव लड़ते रहे। बिहार में पत्रकारिता को मिली बुलंदी के वह बड़े योद्धा रहे।
सहयोगियों के लिए वे संपादक से अधिक अभिभावक रहे हैं। कोई संकट में आया, तो उबारने के लिए सब कुछ दांव पर लगाया। बीमार साथियों की मदद के लिए रात को तीन बजे भी वह पीएमसीएच में जमीन पर पसरे मिलते थे। कोई ‘इगो’ नहीं। हां, भोले बाबा के स्वभाव के कारण विश्वास में बहुतों ने खंजर भोंका।
बाद में जानकर भी कहते थे, जाने दो। गलतियों से चिढ़ जरूर थी, लेकिन किसी को पैदल कर दिये जाने के खिलाफ सदैव रहे। रात दो बजे तक की पारी के चक्कर में कभी परिवार को समय नहीं दिया। अब शायद उनकी कमी परिवार ही नहीं संपूर्ण पत्रकारिता को हमेशा खलेगी। वैसे उम्र के अंतिम पड़ाव तक बड़ी पारी खेलने का माद्दा रखते थे, उनकी फिटनेस तो किसी को भी हरा दे। सच में, आप भूले नहीं जा सकते सर।
मीडिया जगत समेत तमाम राजनीतिक एवं सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग उनके आवास पर पहुंचे। शैलेन्द्र जी दैनिक जागरण के बिहार में स्टेट हेड रह चुके थे। इससे पूर्व वे दैनिक आज कानपुर के भी संपादक रह चुके थे। शैलेन्द्र भैया पूरी तरह से स्वस्थ थे। उन्हें इससे पहले एक बार भी हार्ट अटैक नहीं आया था। आज कुछ बेचैनी होने पर उन्हें कार्डियोलॉजी ले जाया गया, लेकिन डॉक्टर के चेकअप करने से पहले ही दोपहर करीब दो बजे वे चिर निद्रा में सो गए।
शैलेन्द्र दीक्षित का जाना पत्रकारिता जगत के बड़े स्तंभ का गिर जाना है। संपादक जी के रहने मात्र से पत्रकारों को एक संबल मिलता था। उन्होंने सच कहने और लिखने की ताकत प्रदान की थी। उनके चाहने वालों को उनकी कही हर बातें याद आ रही हैं। पत्रकार सनातन विपक्ष होता है, उन्होंने ही सिखाया।
बिहार में दैनिक जागरण अखबार को विस्तारित और खास मुकाम पहुंचाने में शैलेंद्र दीक्षित का बड़ा योगदान था। बिहार के शायद ही किसी जिले में कोई वरीय पत्रकार होंगे जिन्हें उनका साथ और मार्गदर्शन नहीं मिला।

शैलेंद्र दीक्षित पत्रकारिता के स्टाइल ऑइकन थे। लंबाई ज्यादा नहीं थी, पर उनकी चाल शेर की तरह निर्भीक और भाव निर्विकार था। उनका चलना बता देता था, कोई नहीं है टक्कर में। वे पाठक के अलग-अलग वर्ग को लक्ष्य करते और उनके लिए सामग्री देने की कोशिश करते।
बुजुर्गों का बागबान क्लब इन्हीं की देन है। बागबान की पूरी सीरीज चलवाई थी उन्होंने। किसी एक मुद्दे पर निकलने वाली कसौटी इन्हीं की देन थी। इस पुल आऊट में देश का शायद ही कोई ऐसा विचारक या साहित्यकार हो, जिसने नहीं लिखा हो।
‘राह पकड़ तू एक चला चल पा जाएगा मधुशाला’ दीक्षित जी की जुबां से गाते हुए सहकर्मियों ने कई बार सुना है। हर मुश्किल में जीने की कला उन्हें मालूम थी और लोगों को उन्होंने बताया कि कैसे जीते हैं । कुछ लोगों को आज उन्होंने सुबह के गुड मॉर्निंग का जवाब भी दिया। पर विधाता.. पत्रकारों को गढ़ने वाले और अखबार को जीने वाले दीक्षित सर नहीं नहीं रहे। उनकी स्मृति बिहार में ऐसी कि लोग उन्हें भूल नहीं सकते।
बिहार, झारखंड व बंगाल में बदलाव की पत्रकारिता के पुरोधा थे शैलेंद्र दीक्षित
बिहार, झारखंड व बंगाल में बदलाव की पत्रकारिता के पुरोधा शैलेन्द्र दीक्षित का सोमवार दोपहर निधन हो गया। उन्हें दिल का दौरा पड़ा था, जब तक उनके भाई और अन्य सहयोगी उन्हें लेकर अस्पताल पहुंचते, रास्ते में ही उन्होंने दम तोड़ दिया। डॉक्टरों ने उन्हें देखते ही मृत घोषित कर दिया। पढ़िए शैलेंद्र दीक्षित आखिरी वक्त में क्या हुआ, पूरी रिपोर्ट सिर्फ देशज टाइम्स पर
तीन राज्यों में दमदारी के साथ रखी थी दैनिक जागरण अखबार की नींव
66 वर्षीय वरिष्ठ पत्रकार शैलेंद्र दीक्षित को दोपहर 2.13 मिनट में उलझन और बेचैनी महसूस हुई। उन्होंने अपने प्रिय और दैनिक जागरण के वरिष्ठ पत्रकार ऋषि दीक्षित को फोन करके लक्ष्मीपत सिंहानिया हृदय रोग संस्थान में दिखाने के लिए कहा। तत्काल उनके भाई डॉ. अरुण दीक्षित अपने साथ लेकर चले।
हृदय रोग संस्थान ले जाते समय रास्ते में ही वह बेसुध हो गए। हृदय रोग संस्थान में चेकअप करते ही उन्हें मृत घोषित कर दिया। उनका पार्थिव शरीर कानपुर के हरबंश मोहाल स्थित निवास पर अंतिम दर्शन के लिए रखा गया है। उनके मित्रों और शुभचिंतकों को जैसे ही पता चला, उनके पार्थिव देह के दर्शन के लिए उनके घर पहुंचने लगे।
वरिष्ठ पत्रकार शैलेंद्र दीक्षित अपनों के बीच संपादक जी के नाम से जाने जाते थे। सेवानिवृत्त होने के बाद भी एक फोन पर लोग उनके लिए खड़े रहते थे। उनके सिखाए पत्रकार देश भर के सभी प्रतिष्ठित समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और न्यूज चैनलों में कार्यरत हैं। तीन दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय थे।
सामाजिक और खबरों के जादूगर अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गये है। उनके परिवार में तीन पुत्र, पुत्र वधुएं, पौत्र-पौत्री हैं। जिस समय उनका निधन हुआ, उनके निधन से पत्रकार जगत में शोक की लहर है। उनके निधन की खबर पाकर कानपुर के पत्रकार, समाजसेवी, जनप्रतिनिधि कानपुर स्थित आवास पहुंच शोक संवेदना प्रकट कर रहे है।
कानपुर जर्नलिस्ट क्लब के अध्यक्ष ओम बाबू मिश्रा, महामंत्री अभय त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार कैलाश अग्रवाल, गजेंद्र सिंह, आलोक अग्रवाल, कुमार त्रिपाठी, सीनियर जर्नलिस्ट गौरव चतुर्वेदी, शैलेन्द्र मिश्रा, अजय पत्रकार, बार एसोसिएशन के पूर्व महामंत्री नरेश चन्द्र त्रिपाठी समेत शहर के सभी वरिष्ठ पत्रकारों और बुद्धजीवियों ने शैलेन्द्र जी के निधन पर शोक व्यक्त किया है।
उनके निधन से पत्रकारिता जगत को अपूरणीय क्षति हुई है। देशज टाइम्स परिवार की ओर वरिष्ठ पत्रकार शैलेंद्र दीक्षित जी को विनम्र श्रद्धांजलि। इधर, उनके निधन पर शोक संवेदनाओं का तांता लगा है।
हर कोई गम में
पत्रकारिता और राजनीतिक गलियारों से लेकर साहित्य और सांस्कृतिक जगत तक शोक की लहर में डूब गया। पत्रकारिता के इस पुरोधा का जाना एक ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई संभव नहीं। पटना से दैनिक जागरण की शुरुआत करने वाले संपादक जी और सबके बड़े भैया ने न सिर्फ बिहार की पत्रकारिता का चेहरा बदला था, निर्भीक और जोशीले पत्रकारों की फौज खड़ी की है। सोमवार को कानपुर के निजी अस्पताल में हृदय गति रुकने से शैलेंद्र दीक्षित का निधन हो गया। दीक्षित जी दैनिक जागरण के पटना संस्करण से 23 अगस्त 2014 को सेवानिवृत हुए थे।
दीक्षित सर उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे, पर बिहार से उनका गहरा नाता रहा। बिहार से दैनिक जागरण की लांचिंग के लिए जब से उन्होंने पटना की धरती पर कदम रखा था, यहीं के होकर रह गए।
यही वजह है कि सेवानिवृति के बाद भी उन्होंने पटना नहीं छोड़ा। पटना से ही उन्होंने न्यूज पोर्टल बिफोर प्रिंट की शुरुआत की और पत्रकारिता में सक्रिय रहे। दैनिक जागरण में रहते हुए और बाद में भी दीक्षित सर ने पत्रकारों को निर्भीकता का पाठ पढ़ाया।
आज दैनिक जागरण ही नहीं, देश के कई मीडिया हाउस के शीर्ष पदों पर शैलेंद्र दीक्षित के सानिध्य में कार्य कर चुके पत्रकार कार्यरत हैं। बिहार का प्रभाव दीक्षित सर पर ऐसा पड़ा था कि वे खुद यहां के लोक पर्व छठ का अनुष्ठान पूरे भक्ति भाव से अपने अंतिम समय में यूपी प्रवास के दौरान भी करने लगे थे।
शैलेंद्र दीक्षित हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके ना होने के बीच भी पत्रकारिता उनके होने का सबब जरूर तलाश लेगा। देशज टाइम्स की ओर से भावभीनी नमनांजिल। उनका अंत्येष्टि संस्कार मंगलवार 22 फरवरी को सुबह 11बजे कानपुर के गंगा तट स्थित भगवत दास घाट पर होगा।


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