
Israel-Iran conflict: पश्चिम एशिया के आसमान में जब युद्ध के बादल गहरा रहे हैं और हर देश अपने हितों के तराजू पर भू-राजनीतिक समीकरणों को तौल रहा है, तब भारतीय राजनीति में एक अप्रत्याशित तस्वीर सामने आई है। कांग्रेस के भीतर ही केंद्र सरकार के रुख को लेकर मतभेद उभर आए हैं, जहां एक तरफ पार्टी हमलावर है, वहीं एक वरिष्ठ नेता ने संयम को ही शक्ति बताया है।
जब पूरा देश अमेरिका-इजराइल-ईरान संघर्ष पर केंद्र सरकार की चुप्पी को लेकर कांग्रेस के हमलों का गवाह बन रहा है, तब पार्टी के वरिष्ठ सांसद शशि थरूर ने एक अलग राह चुनी है। उन्होंने भाजपा नेतृत्व वाली सरकार के रुख का खुलकर समर्थन किया है। थरूर ने इसे नैतिक गिरावट नहीं, बल्कि जिम्मेदार शासन का प्रतीक बताया है। तिरुवनंतपुरम से सांसद ने एक बातचीत में कहा कि यदि उन्हें कांग्रेस सरकार को सलाह देनी होती, तो वे उनसे मौजूदा स्थिति में संयम बरतने का आग्रह करते, ठीक वैसे ही जैसे केंद्र सरकार कर रही है। उनके अनुसार, संयम कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति का परिचायक है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
Israel-Iran conflict पर थरूर का ‘पार्टी लाइन से हटकर’ समर्थन
थरूर ने स्पष्ट किया कि यदि वे कांग्रेस सरकार को परामर्श दे रहे होते, तो उनकी प्राथमिक सलाह यही होती कि इस नाजुक घड़ी में संयम ही सर्वोपरि है। उन्होंने कहा, “संयम का अर्थ हार मानना नहीं है; यह एक ताकत है, यह दर्शाता है कि हम अपने राष्ट्रीय हितों को भली-भांति समझते हैं और सर्वप्रथम उनकी सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं।” यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि थरूर के इस बयान से पहले, कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार की विदेश नीति पर गंभीर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि मौजूदा हालात हमारी भारतीय विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा करते हैं।
भारत का संतुलित दृष्टिकोण: थरूर और तिवारी एकमत
इससे पूर्व, कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भी पश्चिम एशिया में जारी तनाव पर केंद्र सरकार के संतुलित और संयमित रुख का समर्थन किया था। उन्होंने तर्क दिया कि भारत का इस क्षेत्र में ऐतिहासिक रूप से सीमित दखल रहा है और उसे अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को सदैव प्राथमिकता देनी चाहिए। ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच गहराते तनाव पर टिप्पणी करते हुए तिवारी ने कहा कि इस संकट की व्यापकता और जटिलता को देखते हुए नई दिल्ली का सतर्क कूटनीतिक दृष्टिकोण पूरी तरह से उचित है।
तिवारी ने इस बात पर विशेष बल दिया कि पश्चिम एशिया केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि कई परस्पर विरोधी संघर्षों का साक्षी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “इज़राइल और ईरान के बीच चल रहा घटनाक्रम और उसमें अमेरिका का एक पक्षीय समर्थन, केवल मध्य पूर्व की आंतरिक स्थिति का विषय नहीं है… यह हमारा युद्ध नहीं है। भारत हमेशा से ही वृहत्तर मध्य पूर्व में एक सीमित भूमिका में रहा है।” उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत को ऐसी भू-राजनीतिक उथल-पुथल में उलझने से बचना चाहिए, जिनका उससे प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
संयम के महत्व पर जोर देते हुए, मनीष तिवारी ने कहा कि भारत का सतर्कतापूर्ण रवैया बिल्कुल सही दिशा में उठाया गया कदम है। उन्होंने आगे कहा, “यदि हम सतर्क हैं, तो संभवतः हम सही कर रहे हैं, क्योंकि रणनीतिक स्वायत्तता का मूल अर्थ यही है – अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना और उचित मार्ग पर आगे बढ़ना।” संकट की शुरुआत से ही, भारत ने पूरे क्षेत्र में अपने विविध हितों को संतुलित करते हुए लगातार संवाद और कूटनीति के माध्यम से समाधान का आह्वान किया है। वैश्विक मंच पर भारत की यह स्थिति उसकी दूरदर्शी विदेश नीति का प्रमाण है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।



