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फ़रवरी, 17, 2026
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UGC Rules पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: शिक्षा में समानता के नए नियमों पर लगाई रोक, जानिए पूरा मामला

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UGC Rules: ज्ञान के गलियारों में जब समानता की नई इबारत लिखी जाने लगी, तो न्याय के मंदिर ने उसे कसौटी पर परखने का फैसला किया। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के 2026 के समानता नियमों के संचालन पर रोक लगा दी, जो जातिगत भेदभाव की परिभाषा से संबंधित थे। न्यायालय ने केंद्र सरकार और यूजीसी को इन नए ढाँचे को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर नोटिस जारी किए हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। याचिकाओं की सुनवाई करते हुए, शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि वह शिक्षण संस्थानों में “स्वतंत्र, निष्पक्ष और समावेशी वातावरण” सुनिश्चित करना चाहती है, लेकिन साथ ही यह भी चिंता व्यक्त की कि नए नियम समाज को विभाजित कर सकते हैं। पीठ ने निर्देश दिया कि फिलहाल 2012 के पुराने नियम ही लागू रहेंगे।

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UGC Rules: सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और पुरानी व्यवस्था की बहाली

सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले की गहन सुनवाई का संकेत दिया है। यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ अधिवक्ता विनीत जिंदल, मृत्युंजय तिवारी और राहुल दीवान ने याचिकाएं दायर की हैं। यूजीसी ने हाल ही में उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026 जारी किए थे। इन विनियमों का मुख्य उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में वंचित समूहों की शिकायतों के निवारण और सहायता के लिए एक संरचित ढाँचा तैयार करना था।

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हालांकि, इन नए नियमों ने छात्रों, शिक्षकों और विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच तीव्र प्रतिक्रिया और आक्रोश पैदा कर दिया है। नाराजगी का मुख्य कारण यूजीसी के नियमों में “जाति-आधारित भेदभाव” शब्द की परिभाषा को लेकर है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह परिभाषा मूल भावना से हटकर है।

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समानता की बहस और न्यायपालिका का सुझाव

मुख्य न्यायाधीश ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से इस मामले की गंभीरता को देखते हुए कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तियों की एक समिति गठित करने पर विचार करने को कहा, ताकि समाज बिना किसी भेदभाव के एक साथ विकास कर सके। यह सुझाव दर्शाता है कि न्यायालय इस संवेदनशील मुद्दे पर व्यापक और समावेशी समाधान चाहता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। अधिवक्ता विष्णु जैन ने अदालत में तर्क दिया कि धारा 3सी के तहत दी गई भेदभाव की परिभाषा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के दायरे से पूरी तरह बाहर है, क्योंकि भेदभाव को पहले ही परिभाषित किया जा चुका है और यह नहीं माना जा सकता कि भेदभाव केवल एक वर्ग के खिलाफ है। उनके अनुसार, यह नई परिभाषा संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है और इससे भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह पूरा मामला शिक्षा के क्षेत्र में समानता और न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बहस का केंद्र बन गया है, जिस पर देश भर की निगाहें टिकी हैं।

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